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गुरुवार, 30 मार्च 2017

"जीवन जाह्नवी"

Karpatri Dharamsamrat varanasi kedar ghat ganga ganges
प्रातः स्मरणीय ।
परम पूज्य ।
धर्मसम्राट ।
॥ स्वामी करपात्री जी महाराज की जय हो ॥
हर हर महादेव ।
॥ जय जगदंबिके ॥
ब्रह्मलीन धर्मसम्राट् स्वामी श्रीकरपात्रीजी महाराज

‘करपात्र स्वामी’, अर्थात् ‘कर’ ही है पात्र जिनका – ऐसे स्वामी हरिहरानंद सरस्वती संसार में ‘करपात्री जी’ के नाम से प्रसिद्ध हुए । वे एक युगपुरुष थे । इतिहास साक्षी है कि भारत की इस पवित्र भूमि ने समय-समय पर ऐसे संत-महात्माओं और आचार्यों को अवतरित किया, जिनके जीवनसे भारतीय संस्कृति तथा सनातन धर्म को प्रकाश तथा संजीवनी मिली । इसी कडी में, आदिशंकराचार्य की परंपरा में अनंत श्रीस्वामी करपात्री जी महाराज अवतरित हुए । उनमें अलौकिक प्रतिभा, तपस्या एवं साधनाका असीम तेज था । कलि के इस प्रथम चरण में जीवनपर्यंत वर्णाश्रम व्यवस्था और धर्म की रक्षा के लिए वे संघर्षरत तो रहे ही, जगत को वेद-शास्त्र और धर्म के सूक्ष्म तत्वों से अवगत भी कराया ।
सारणी
१. पारिवारिक जीवन २. ज्ञानसंपादन ३. महामना मालवीयजीसे शास्त्रार्थ ४. साधना ५. गुरुप्रप्ती ६. धर्मप्रसार ७. सुमेरुपीठकी स्थापना ८. दिनचर्या ९. सनातनधर्म-विजय-महोत्सव १०. आक्षेपोंके (शंकाओं, आपत्तियोंके) समाधानार्थ ग्रन्थ रचना ११. मेरा नहीं रामका चित्र चाहिए १२.भगवदबुद्धि भगवानकी पूजाका अमोघ साधन  
पारिवारिक जीवन
एक बार महाराज श्री ने स्वयं बताया था कि बाल्यावस्था में जब वे किसी संत-महात्मा या साधुको देखते थे, तो उनके मनमें उनके प्रति स्वाभाविक आकर्षण उत्पन्न हो जाता था । उस समय उनकी यही इच्छा होती कि मैं भी उनके साथ हो जाऊं । कई बार तो वे साधुओंके साथ जाने भी लगते; परंतु परिवारके लोग उन्हें पकडकर लौटा ले आते । उनके पिताजीने जब अनुभव किया कि इनका मन घर-गृहस्थी में नहीं लग रहा है, तो उन्होंने किशोरावस्था में ही इनका विवाह कर दिया । उन्हें आशा थी कि विवाह के उपरांत सामान्य रूप से घर-गृहस्थीके कार्यों में ये आसक्त हो जाएंगे । परंतु विधि की विडंबना कुछ और ही थी । विवाहके पश्चात् तथा पत्नी के आ जानेपर भी वे घर-गृहस्थीके प्रति पूर्ववत् ही उदासीन एवं अनासक्त रहते । साधु-संतोमें ही उनका मन रमा रहता था । संसारसे विरक्त रहते थे । पिता ने जान लिया कि अब यह अधिक दिनोंतक घर में टिकनेवाला नहीं है । पिताकी इच्छा थी कि एक संतान हो जाती तो वंश चलने लगता । पिताकी इच्छा पूरी हुई । एक कन्याका जन्म हुआ । तदुपरांत कुछ ही दिनों पश्चात्, घरसे निकल पडे । पारिवारिक जनों ने इन्हें पुनः घर लौटानेका बहुत प्रयत्न किया; परंतु वे संसारकी नश्वरता से परिचित हो चुके थे । उत्कट वैराग्य जागृत हो चुका था । अतः परमार्थ-पथसे लौटकर पुनः घर आना उन्हें स्वीकार नहीं हुआ ।
ज्ञानसंपादन
अलवर में नर्मदा के तटपर स्वामी श्री विश्वेश्वरानंदजी महाराजश्रीके विद्यागुरु थे । वहां महाराज ने लगभग २ वर्ष के अल्पकालमें ही व्याकरण, न्याय, सांख्य और वेदान्तकी शिक्षा प्राप्त की । साथ ही, प्रस्थानत्रयी आदि विषयोंमें वे निपुण हो गए । महाराजश्रीकी प्रतिभा इतनी प्रखर थी कि जिस विषयको वे एक बार देख लेते, वह उन्हें आत्मसात हो जाता था । ऋषिकेशमें कोयलघाटी नामक स्थान है, जहां एक पुरातन वट-वृक्ष आज भी स्थित है । उस वृक्षके कोटरमें एक व्यक्तिके रहने योग्य स्थान है, जिसमें महाराजश्री विश्राम किया करते थे । उन दिनों लंगोटी के अतिरिक्त महाराजश्रीके पास कोई वस्त्र नहीं होता था । तीन दिन अथवा सात दिन उपरांत दूधकी भिक्षा, कर (हाथ) से ही ग्रहण करते थे । इसीलिए वे आगे चलकर ‘करपात्रीस्वामी’, इस नामसे प्रसिद्ध हुए । उस समय स्वामी जी यात्राके लिए किसी प्रकारके यान अथवा वाहनका उपयोग नहीं करते थे; पैदल ही यात्रा करते थे ।
महामना मालवीय जी से शास्त्रार्थ
जिन दिनों महाराजश्री ऋषिकेशमें रहते थे, उन दिनों वे प्रकाशमें तब आए, जब महामना मदनमोहन मालवीयजीसे उनका शास्त्रार्थ हुआ । यद्यपि श्री मालवीयजी सनातन धर्मी नेता थे; परंतु समय और परिस्थितिके अनुसार स्त्री और शूद्रको भी प्रणवकी दीक्षा देने का समर्थन करते थे और इसे शास्त्र-सम्मत बताते थे । उन्होंने इस विषयपर शास्त्रार्थ की भी घोषणा कर दी । कुछ लोग, जो महाराजश्री से परिचित थे, उनसे मिले और प्रार्थना करने लगे कि आप जैसे विद्वान के रहते, इस प्रकारके आह्वानका सामना होना ही चाहिए । इस विषयमें शास्त्र-सम्मत निर्णय होना ही चाहिए । शास्त्र विपरीत कोई भी बात महाराज श्री को सहन नहीं होती थी । उस समय महाराजने कोई उत्तर नहीं दिया । शास्त्रार्थके लिए एक विशेष मंचका निर्माण किया गया, जहां ध्वनिवर्धक एवं ध्वनिक्षेपक आदि उपकरण लगे थे । उस क्षेत्रके प्रतिष्ठित लोग शास्त्रार्थमें आमंत्रित थे । मालवीयजी अपनी बातके पक्षमें तर्क-युक्ति और शास्त्रीय प्रमाण अपने भाषणमें मंचपर प्रस्तुत कर रहे थे । मंचसे थोडी ही दूर एक वृक्षके नीचे लंगोटी बांधे एक युवासाधु खडा होकर मालवीयजीके तर्क-युक्ति और प्रमाणोंका उत्तर देने लगा ।
धीरे-धीरे कुछ श्रोता वहां जुटने लगे । थोडे ही समयमें यह बात विद्युलता की भांति आस-पास के क्षेत्रों में प्रसारित हो गयी कि एक प्रतिभावान निष्कांचन साधु एक वृक्षके नीचे खडा होकर मालवीयजी की बातों का उत्तर दे रहा है । अब तो संत-महात्मा और विशिष्ट जन भी वहां पहुंचने लगे । मंचपर आसीन लोग भी उस महात्माका उत्तर सुननेको आतुर हो गए । यह बात मालवीयजी के कानोंतक जा पहुंची और लोगों ने उनसे आग्रह किया कि उस साधुको इस मंचपर लाया जाए । कुछ लोगोंने महाराजश्रीको पहचाना । मालवीयजी स्वयं वृक्षके नीचे पधारे और महाराजश्रीसे मंच पर आने का आग्रह किया । महाराजने तत्काल शास्त्रार्थका आह्वान स्वीकार कर लिया, एवं मंचपर मालवीयजी से शास्त्रार्थ होना निश्चित हो गया । सेठजी श्री. जयदयालजी गोयंद का तथा सेठ श्री. गौरीशंकरजी गोयन्दका मध्यस्थ बनाए गए । तीन दिनों तक शास्त्रार्थ चला । मध्यस्थों ने यह निर्णय दिया कि महाराजश्रीका पक्ष ही शास्त्र-सम्मत है । मालवीयजी अपनी बात देश-काल-परिस्थिति के अनुसार कहते हैं । उस समय सर्वप्रथम ही सर्वसाधारण समाजको महाराज श्री का परिचय हुआ और वे जनता-जनार्दनके प्रकाश में आए ।
साधना
उस घटनाके पश्चात्, कुछ दिन महाराजने वृंदावनमें निवास किया । वहां उन्होंने निराहार रहकर स्वान्तः सुखाय श्रीमद्भागवत-सप्ताहका पाठ किया । उन दिनों वे सप्ताहमें एक बार कर (हाथ)- द्वारा दूधकी भिक्षा मांगते । दूसरे सप्ताह पुनः पाठ आरंभ कर देते । इस प्रकार अनेक दिनों तक यह कार्यक्रम चलता रहा ।
एक बार किसी प्रसंगवश महाराजने मुझे बताया कि वे भीषण जाडे के समय पौष मास की अर्धरात्रि में निर्वस्त्र ही केवल एक लंगोटी धारणकर साधना करने बैठ जाते थे और संपूर्ण रात्रि साधनामें लगे रहते थे । इसके अतिरिक्त विविध प्रकारकी यौगिक क्रियाएं भी महाराजने संपन्न की । खेचरी आदि यौगिक क्रियाएं, जिनमें जिह्वा काटनेकी क्रिया एवं इन्द्रिय द्वारा पारा खींचने की भी क्रिया होती है, ये सब महाराज ने की । मैंने एक बार महाराज जी से पूछा – ‘‘महाराज, ये सब आपने क्यों किया ?’’ महाराज ने उत्तर दिया – ‘‘कुतूहलवश हमने यह सब करके देखा कि इन सबमें कौन-सा तत्व है ।’’ इस प्रकार महाराजश्रीने प्रायः संपूर्ण यौगिक क्रियाएं तथा हठयोग की साधना पूरी की ।
गुरुप्राप्ति
महाराज ने प्रारंभमें विद्वत संन्यास लिया था । पश्चात् विद्वानोंकी सभामें इस विषयमें विचार-विमर्श किया गया और निर्णय हुआ कि शास्त्रानुसार संन्यास ग्रहण करनेके लिए दण्ड आदि धारणकर लिङ्ग-संन्यास लेना चाहिए । महाराजने तत्कालीन ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगदगुरू शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी से दण्ड ग्रहण किया । ज्योतिष्पीठाधीश्वर स्वामी ब्रह्मानन्दजी भी करपात्रस्वामी जैसे योग्य शिष्य को पाकर कृत कृत्य हो गए । उन्होंने निर्णय लिया कि मेरे बाद उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठ-शंकराचार्य के पदपर स्वामी करपात्रजीको ही अभिषिक्त किया जाएगा ।
धर्मप्रसार
महान संत विश्ववंद्य, धर्मसम्राट, श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य, परमवीतराग, यतिचक्रचूडामणि अनंत श्रीविभूषित, दण्डी संन्यासी, श्रीहरिहरानन्द सरस्वती स्वामी श्री करपात्री जी महाराज हैं । प्रश्न चाहे वर्णाश्रम मर्यादा संरक्षणका हो अथवा शाश्वत सनातन धर्मके सत्य सिद्धान्तोंके संस्थापनका हो, वैदिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार में उन्होंने अपना सर्वस्व लगा दिया । पराधीन भारतमें जन-जनमें राजनीतिक चेतना जागृत करनेका कार्य तो अनेक कर्मनिष्ठ नेताओं ने किया, किंतु विपरीत गति, कलुषित वातावरण एवं अल्पसहयोगमें भी धर्म, संस्कृति, वेद, शास्त्र, मंदिर, गौ, ब्राह्मण, यज्ञ एवं आस्तिकवादके रक्षणार्थ जन- साधारणमें व्यापक प्रचार करनेके गुरुतर कार्यका संपादन यदि किसीने किया है, तो वे हैं एक मात्र शिवावतार श्री स्वामी करपात्रीजी महाराज । अतः जिसे अनादि अपौरुषेय वेदोंका दर्शन करना हो, जिसे वेदादि सत्शास्त्रों एवं पुराण, स्मृति, आदिका मूर्त रूप देखना हो, उसे एक ही व्यक्तिमें यह सर्व दर्शन हो सकता है और वे हैं श्री स्वामी करपात्रीजी महाराज । महाराजश्री की अध्यापनकला भी अनोखी थी । जब वे शास्त्रीय विषय का प्रतिपादन करते थे, तो शिष्यगणों के चित्तमें वह सर्वदाके लिए अंकित हो जाता था, जो भुलाए भी नहीं भूलता था ।
उनकी चतुः सूत्री –
१. धर्म की जय हो ।
२. अधर्म का नाश हो ।
३. प्राणियों में सद्भावना हो ।
४. विश्व का कल्याण हो ।
सुमेरुपीठकी स्थापना
धर्मप्रचारार्थ देश के चारों कोनों में चार पीठोंकी स्थापना आदिशंकराचार्यने की थी । परंतु, शास्त्रोंमें इसके अतिरिक्त सुमेरुपीठका वर्णन भी मिलनेके कारण महाराजश्रीने काशीमें पांचवें पीठ ‘सुमेरुपीठ’की स्थापना की, जिसके शंकराचार्य-पदपर सर्वप्रथम अनंतश्री स्वामी महेश्वरानंद सरस्वतीजी महाराज का प्रयागराजमें अभिषेक किया गया ।
दिनचर्या
स्वामी श्रीकरपात्रीजीकी दिनचर्या भी विलक्षण थी, जिसे उनके भक्तगण भी नहीं जान पाए ।
कई-कई दिवस तक निर्जल व्रत, ढाई घण्टे का शीर्षासन, रात्रि डेढ़ बजे ही उठकर प्रतिदिन दस मील पैदल भ्रमण, घंटों एक आसन से बैठकर अध्ययन एवं लेखन, पूजन के त्रिकाल नियमों का अक्षरशः पालन, २४ घण्टों में एक बार सामान्य भिक्षा पत्तल या हाथ पर रखकर ही ग्रहण करना, साठ वर्षों से नमक-मिष्टान्न का परित्याग, अनवरत धर्मयात्रायें, भाषण, आंदोलन, विभिन्न विषयों पर शास्त्रीय पक्ष एवं विचार उपस्थापन ।
यह बात प्रसिद्ध थी कि महाराज को भिक्षा ग्रहण करने में समय नहीं लगता था, ३ अथवा ५ पलमें ही उनकी भिक्षा समाप्त हो जाती थी । जो समय लगता था, वह केवल भगवानका भोग लगाने में ही लगता था ।
अहर्निश धर्म-शास्त्र, वेद गो संरक्षण में सक्रिय इस ऋषि को पाकर सचमुच आज भारत माता धन्य हुई है ।
समाज सेवा में रत 'सर्वजन सुखाय' , 'सर्वजन हिताय', चतुः सूत्री का भारतीय वैदिक सनातन भावना को अजस्त्र अबाध अविरल गति से इस भीषण कलिकाल में अकेले ही आगे बढ़ाने के कार्य चौबीसों घण्टे व्यस्त इस सन्यासी को शत-शत प्रणाम, जो व्यक्ति आकृति में देव तुल्य पवित्र ।
धन्य हैं वो लोग जिन्होने इनके दर्शन किये हैं, अभागे हैं वो लोग जो आज भी उनसे अपरिचित हैं ।
श्रीहरि --  उनका यह कार्यक्रम नित्य नियमित रूपसे चलता रहता । यहाँ तक कि यात्रा में भी वे इस कार्यक्रम का निर्वाह पूरी तत्परतासे करते । महाराजकी यात्रा लोहपथगामिनी से नहीं होती थी । वे मोटरकार से ही यात्रा करते थे । रात्रिमें गाडी तब तक चलती, जबतक उनका शयन चलता रहता । रात्रिमें १ बजे गाडी रोक दी जाती और वे अपने दैनिक कृत्यों में व्यस्त हो जाते । महाराज की पूजा-अर्चा प्रतिदिन ३ बार होती थी । प्रातः कालीन पूजा प्रायः एकाकी करते थे । मध्याह्नकालीन पूजा दिनमें लगभग १२ बजे तथा सायंकालीन पूजा रात्रिमें ७.३० से ९.३० बजेतक चलती । दोपहर और रात्रिका पूजन सर्वसाधारण भक्तजनोंके मध्य होता । प्रातः ८ से १२ तक तथा सायं ६ से ७.३० के मध्य सर्वसाधारणसे मिलने-जुलने तथा पठन-पाठन, स्वाध्याय और लेखन आदि कार्य होता ।
परिपक्व वैराग्य
ग्रीष्म, वर्षा, शिशिर सभी ऋतुओंमें वे प्रायः एक ही चादर ओढकर सोते थे ।
निर्जला एकादशी-व्रत
महाराजजी नियमके अटल थे । प्रत्येक एकादशी को उनका निर्जल व्रत रहता था । मार्ग में या कहीं भी भीषण-से-भीषण ग्रीष्मकाल अथवा आपत्कालमें भी वे एकादशीको जल ग्रहण नहीं करते थे ।
सनातनधर्म-विजय-महोत्सव
स्वामी दयानन्द सरस्वतीके निर्वाणको १०० वर्ष पूरे होनेपर आर्यसमाजने उनका शताब्दी समारोह मनाया और यह घोषणा की कि स्वामी दयानन्दके अनुयायी आर्यसमाजी विद्वान् शास्त्रार्थ में, दिग्दिगन्त में विजय-यात्रा करते हुए पधार रहे हैं । यहां ये अवतारवाद, मूर्तिपूजा और श्राद्धादि रूढियोंका खण्डन करेंगे । जो चाहे उनसे शास्त्रशास्त्रार्थ कर सकता है । महाराजश्री इस आह्वानको कब सहन कर सकते थे । उन्होंने तुरंत इस आह्वान को स्वीकार करते हुए कहा, ‘धार्मिक क्षेत्रमें भी पंचशील का सिद्धांत माना जाना चाहिए । अपनी-अपनी आस्था-मान्यता और विश्वासके अनुसार सबको अपने धार्मिक कृत्य सम्पन्न करने का अधिकार है ।
परंतु किसीके धर्ममें हस्तक्षेप और आक्रमण कभी सहन नहीं किया जा सकता । अतः उसका प्रतिकार किया जाएगा ।’ इस सिद्धांतकी रक्षाके लिए उन्होंने शास्त्रस्त्रार्थ भी करना स्वीकार किया ।
महाराजजीका यह स्वभाव था कि वे शास्त्रशास्त्रीय के विरुद्ध कुछ भी सुनना नहीं चाहते थे । कोई कितना भी निकटतम व्यक्ति क्यों न हो, यदि वह शास्त्रशास्त्रीय सिद्धातों के विरुद्ध कुछ कहता है अथवा लिखता है, तो महाराज तत्काल उसका खण्डन करते और उस बातका युक्ति और तर्कसहित शास्त्रशास्त्रके पक्ष में उत्तर देते थे ।
आक्षेपोंके (शंकाओं, आपत्तियों के) समाधानार्थ ग्रन्थ रचना
कुछ व्यासगणों ने एक बार महाराजश्री को कामिल बुल्के की लिखी ‘रामकथा’ लाकर दी तथा कामिल बुल्के द्वारा विभिन्न रामायणों का संदर्भ देकर भगवान् राम और भगवती सीता पर जो आक्षेप किए गए थे, उस ओर ध्यान आकृष्ट किया । तब महाराजजीने तत्काल उन सभी आक्षेपोंका उत्तर लिखा तथा जिन रामायण ग्रंथोंका संदर्भ बुल्के ने दिया था, उन सभी ग्रंथोंको देखकर रामायणसे संबाधित जो भी शंकाएं थीं, उन सबका निराकरण एवं समाधान ‘रामायण-मिमांसा’ नामक ग्रंथ लिखकर किया । इसी प्रकार आचार्य रजनीशकी ‘संभोगसे समाधिकी ओर’ तथा ‘समाजवाद और पूंजीवाद’ पुस्तक किसी ने महाराजको लाकर दी । महाराजजीने उन्हें पढा और तत्काल उसका उत्तर लिखे बिना नहीं रह सके । शास्त्रशास्त्रीय सिद्धांतों के विपरीत देशभक्ति, राष्ट्रवाद, और राजनीति से सम्बन्धित विचारधाराओं का खण्डन किए बिना महाराज रह नहीं सकते थे । इस सम्बधमें स्वातंत्रवीर सावरकर तथा गुरु गोलवलकरजी के विचारोंका खंडन महाराजश्री ने ‘विचारपीयूष’ नामक ग्रंथ लिखकर किया ।
मेरा नहीं, #राम का चित्र चाहिए
महाराज द्वारा रचित ‘रामायण-मिमांसा’ पुस्तक के प्रकाशनका दायित्व एक शिष्यपर था । पुस्तक लगभग छप चुकी थी । परंतु आवरण आदि बांधना शेष था । महाराजने एक दिन उससे पूछा कि इस पुस्तक के प्रकाशन में विलंब क्यों हो रहा है ? उसने उत्तर दिया, ‘महाराज, कुछ लोगोंकी भावना है कि इस ग्रंथमें आपका भी एक चित्र होना चाहिए । चित्र बनने में कुछ विलम्ब होने के कारण पुस्तक प्रकाशनमें विलंब हो रहा है ।’ यह सुनकर महाराज कुछ विचलितसे हुए और तत्काल कहा, ‘‘सावधान! इस विषयमें मैं जैसा कहूं, वैसा ही करना, दूसरोंका कहा नहीं करना । यदि चित्र देना ही है, तो भगवान् राम का पञ्चायतन चित्र देना, मेरा नहीं ।’’
विदेश-यात्राके संबन्धमें महाराज यह कहते कि आज तो पण्डित और सनातनधर्मी प्रायः सभी विदेश यात्रा करते हैं । मैं किसे मना करूं । अपनी मानसिक-दुर्बलता के कारण शास्त्र के विपरीत कोई व्यक्ति आचरण कर सकता है । परंतु वह यदि अपने इस कृत्यको शास्त्रसम्मत सिद्ध करने की चेष्टा करता है, तो यह घोर अन्याय है । सत्पुरुषों को प्रामाणिकता से अपनी मानसिक-दुर्बलता को स्वीकारते हुए शास्त्र का यथार्थ प्रतिपादन इस प्रकार से करना चाहिए, जिससे आनेवाली पीढियों को शास्त्र के वास्तविक अर्थ को समझने में भ्रम न रह जाए । महाराजश्री ने तत्काल विदेश-यात्रा पर कई लेख लिखे, जिसमें शास्त्रीय दृष्टि से विदेश-यात्रा के निषेध का प्रतिपादन किया गया ।
मंदिर-मर्यादा का संरक्षण तथा श्रीकाशी-विश्वनाथकी स्थापना
मंदिर-प्रवेशके संबन्धमें भी महाराजका मत स्पष्ट था । वे हरिजनोंके हृदय से हितचिन्तक थे । एक बार कानपुरमें ‘अखिल भारतवर्षीय धर्मसंघ’का महाधिवेशन चल रहा था । उत्तर प्रदेशके बाबू सम्पूर्णानंदजी वहां पधारे । महाराजश्री भी वहां उपस्थित थे । सम्पूर्णानंदजीने अपने भाषण में हरिजन-प्रवेश की चर्चा की । उनके भाषणके उपरांत महाराजने बडे युक्तिपूर्वक ढंग से उनके सभी प्रश्नों का उत्तर दिया और कहा कि हमारे शास्त्र सम्पूर्ण जीवों के कल्याणका ऐसा उपाय बताते हैं तथा अधिकारानुसार कर्तव्य का निर्देश करते हैं, जिससे वास्तविक कल्याण हो ।
साधु को स्वावलम्बी होना चाहिए
साधु के लिए कलंक किसी संदर्भमें महाराज जी ने कहा कि कभी-कभी साधु के पुस्तकों में, तकियों में तथा बिछावन आदिमें रुपए-पैसे मिलते हैं । यह साधुके लिए कलंक है ।
भगवद्बुद्धि भगवान् की पूजा का अमोघ साधन
बातचीत के क्रममें एक बार महाराज ने बताया कि हमारे धर्मशास्त्रों में मनुष्य के कल्याण के लिए भगवत्सेवा, आराधना जैसी पूजा की बडी सरल विधियों का प्रतिपादन किया गया है । घ रमें पति-पत्नी, माता-पिता, पुत्र-पौत्र, और बन्धु-बान्धवों में मनुष्य का स्वाभाविक स्नेह-प्रेम होता ही है तथा मोह-ममता के वशीभूत होकर उनकी सेवा-अर्चा भी करनी पडती है । यदि हम उन पारिवारिक सदस्यों में मोह-ममता के स्थानपर भगवद्बुद्धि कर लें, वृद्ध माता-पिता को माता अन्नपूर्णा एवं भगवान् विश्वनाथ का स्वरूप मान लें, पति को परमेश्वर, पुत्र को मदनमोहन, श्यामसुंदर, लाडले पौत्र को लड्डुगोपाल, पुत्रवधू को राधारानी, कुमारी कन्या के प्रति भगवती जगदम्बा, इस प्रकारकी भावना बना लें, तो पारिवारिक जनों के निमित्त किए गए सभी कार्य अपनेआप ही भगवान की पूजा में परिवर्तित हो सकते हैं ।
महाराजश्री ने कहा कि ‘जब पत्थर की मूर्तियों में भगवान्की पूजा हो सकती है, तो सचल-सजीव स्नेही जनों में भगवद्भाव हो जाए, तो भगवान की पूजा क्यों नहीं हो सकती ।’
#वाचस्पति: ०९ जनवरी सन् १९७९ को सांयकाल चार बजे श्री संपूर्णा नन्द संस्कृत विश्वविद्यालय की ओर से उच्चतम उपाधि 'वाचस्पति' से सम्मानित किये गये ।
भारतीय संस्कृति और सनातनधर्म को समझने के लिए कोई एक ऐसा ग्रन्थ होना चाहिए, जिसे पढकर सनातनधर्म की सम्पूर्ण बातों की जानकारी हो जाए । यह सुनकर महाराजश्री ने तत्काल उत्तर दिया कि यदि भारतीय संस्कृति और सनातनधर्म की पूर्ण जानकारी के लिए कोई एक ही ग्रन्थ पढना चाहे, तो वह गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी की रामचरितमानस पढे ।
माघ शुक्ला द्वादशी तदनुसार ०५ फ़रवरी १९८२ को जब काशी से पुरी पीठ के वर्तमान शंकराचार्य काशी से उरई प्रस्थान करने लगे तो 'अभिनव शंकर' बोले 'हाँ, हाँ अवश्य जाओ पर देखो सोमवार (८ फ़रवरी) को काशी अवश्य लौट आना - माघ शुक्ला चतुर्दशी संवत २०३८ (०७ फ़रवरी १९८२) को जब ब्रह्मचारी पूजा के पुष्प लेकर समुप स्थित हुआ तो स्वयं केदार घाट वाराणसी में गंगास्नान कर सोपानरोहण पूर्वक निजतपोभूमि वेदानुसंधान संस्थान कक्ष में आकर ब्रह्मचारी को निर्देश दिया की पूजा लगा आ-अनंतर नित्य आराधना समाप्त कर कुछ देर विश्राम किया ।
फिर 'शिव', 'शिव', 'शिव', ले नाम का उच्चारण आरंभ कर दिया ।
श्री सूक्त का पाठ कर नेत्रोन्मिलन कर त्राटक लगा दिया .... श्वास-प्रश्वास की गति का तार तम्य उध्-र्वगामी करते हुए पंचप्राणों को महाप्राण में प्रविलिनीकरण को क्रियात्मक रूप देना प्रारंभ कर दिया तो उपस्थित ब्रह्मचारी ने पुकारा तो एक दूसरे ब्रह्मचारी ने आकर उन त्रिपुंड धारी देव तुल्य पवित्रात्मा के मुखारबिन्दु में तुलसी गंगाजल डाल दिया - उसका पान कर लिया (उक्त क्रिया से शिर-भारी-पीड़ा होने की बात कही) परन्तु मुख से निरंतर 'शिव', 'शिव' निकल रहा था ।
ब्रह्मालिन हो गयी ।
पूर्णिमा को मानो ग्रहण लग गया था ।   
 यह प्रतीत होता था कि महाराजश्रीके जीवनका सम्पूर्ण कार्य योजनाबद्ध था । गृहस्थीके उपरांत तपोमय साधनामय जीवन, धर्मसंघकी स्थापना, यज्ञ-युगका प्रारम्भ, सर्ववेद-शाखा-सम्मेलन, धार्मिक महाधिवेशन, रामराज्य-परिषदके द्वारा राजनीतिमें प्रवेश, हिंदु कोड बिलका प्रबल विरोध तथा गो-हत्या-बंदी आंदोलनका संचालन आदि संपूर्ण कार्य महाराजश्रीके द्वारा सार्वजनिक जीवनमें सम्पन्न हुए । देशमें धार्मिक जगत्की महान् विभूतियों को एक मंच पर लाने का श्रेय महाराजश्री को ही है ।
उन दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघ-संचालक श्री. माधवराव सदाशिव गोलवलकरजी भी स्वामीजी से मिले । उनकी यह भावना थी कि हिंदु संगठन को सुदृढ करने की दृष्टि से हिंदु जगत्के सभी नेता एक मंचपर आएं तथा स्वामीजी महाराजका आशीर्वाद जनसंघको प्राप्त होता रहे । परंतु, वर्णाश्रम-व्यवस्था और मर्यादाके विपरीत राजनीति महाराजश्रीको स्वीकार नहीं थी । वे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम के रामराज्य के अनुसार शास्त्रीय विधि से भारतमें राज्य शासन-संचालन के पक्षधर थे और इसी में वे जगत्का कल्याण मानते थे । अतः इस संदर्भ में कोई समझौता होना सम्भव नहीं था ।
जीवनके उत्तरार्ध में महाराजश्री ने धर्म के बहिर्मुखी कार्यों से स्वयं को समेटना प्रारम्भ कर दिया । अब महाराजश्री की रुचि लेखन-कार्य की ओर अधिक हो गयी । महाराजश्रीने वेदपर भाष्य लिखना प्रारम्भ किया । सर्वप्रथम ‘वेद-भाष्य-भूमिका’ नामक एक बृहद ग्रन्थकी रचना महाराजके द्वारा हुई । जिसमें लगभग एक सहस्रपृठ हैं । इस ग्रन्थ में महाराजने वेदों से सम्बन्धित अब तक के सभी आरोपों का एवं आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद के संपूर्ण आक्षेपों का निराकरण करते हुए प्राचीन ऋषि-महर्षि-प्रणीत परम्परागत सिद्धान्तों का एक बडे समारोह में प्रतिपादन किया । इस ग्रंथ का विमोचन काशी संस्कृत विद्यापीठ में वहां के कुलपति काशिराज डॉ. विभूतिनारायण सिंहके करकमलों से सम्पन्न हुआ । श्री. राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन-संस्थानकी ओरसे इस ग्रंथका प्रकाशन हुआ । तदनन्तर महाराजश्री ने सम्पूर्ण शुक्ल यजुर्वेद पर भाष्य-टीका का प्रणयन किया । ऋग्वेद पर भाष्य लिखा ।
अन्नं न निन्द्यात् । तद्व्रतम् । प्राणो वा अन्नम् । शरीरमन्नादम् । प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम् । शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान् भवति । प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ॥
॥ धर्म की जय हो ॥
॥ अधर्म का नाश हो ॥
॥ प्राणियों में सद्भावना हो ॥
॥ विश्व का कल्याण हो ॥
सत्यमेव परं ब्रह्म सत्यमेव परं तपः ।।
सत्यमेव परो यज्ञस्सत्यमेव परं श्रुतम् ।।
सत्यं सुप्तेषु जागर्ति सत्यं च परमं पदम् ।।
सत्येनैव धृता पृथ्वी सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम् ।।
ततो यज्ञश्च पुण्यं च देवर्षिपितृपूजने ।।
आपो विद्या च ते सर्वे सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ।।
सत्यं यज्ञस्तपो दानं मंत्रा देवी सरस्वती।।
ब्रह्मचर्य्यं तथा सत्यमोंकारस्सत्यमेव च ।।
सत्येन वायुरभ्येति सत्येन तपते रविः ।।
सत्येनाग्निर्निर्दहति स्वर्गस्सत्येन तिष्ठति ।।
पालनं सर्ववेदानां सर्वतीर्थावगाहनम् ।।
सत्येन वहते लोके सर्वमाप्नोत्यसंशयम्।।
अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् ।।
लक्षाणि क्रतवश्चैव सत्यमेव विशिष्यते ।।
सत्येन देवाः पितरो मानवोरगराक्षसाः ।।
प्रीयंते सत्यतस्सर्वे लोकाश्च सचराचराः ।।
सत्यमाहुः परं धर्मं सत्यमाहुः परं पदम् ।।
सत्यमाहुः परं ब्रह्म तस्मात्सत्यं सदा वदेत् ।।
मुनयस्सत्यनिरतास्तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम् ।।
सत्यधर्मरतास्सिद्धास्ततस्स्वर्गं च ते गताः ।।
अप्सरोगणसंविष्टैर्विमानैःपरिमातृभिः ।।
वक्तव्यं च सदा सत्यं न सत्याद्विद्यते परम् ।।
अगाधे विपुले सिद्धे सत्यतीर्थे शुचिह्रदे ।।
स्नातव्यं मनसा युक्तं स्थानं तत्परमं स्मृतम् ।।
आत्मार्थे वा परार्थे वा पुत्रार्थे वापि मानवाः ।।
अनृतं ये न भाषंते ते नरास्स्वर्गगामिनः ।।
वेदा यज्ञास्तथा मंत्रास्संति विप्रेषु नित्यशः ।।
नोभांत्यपि ह्यसत्येषु तस्मात्सत्यं समाचरेत् ।।

सोमवार, 2 नवंबर 2015

Darsana Gokarna


रविवार, 1 नवंबर 2015

‘सौन्दर्यलहरी’


सौन्दर्यलहरी  श्री  आद्य शंकराचार्य द्वारा  विरचित अनुपम रचना  है, अपने  बाल्यकाल में  भगवान् शंकर ने  इसे  रचा था ।  श्री गौड़पादाचार्य  जी  द्वारा  कथित  सुभगोदय  का  ही  प्राकट्य यह  कादि, हादि  विद्याओं  की  सारसर्वस्वविभूषिता  सौंदर्य लहरी  है  , सुभगोदय  का  अभिप्राय  है सुभगा अथवा  सौभाग्य का  उदय   जिसका  आतंरिक  अभिप्राय  कुण्डलिनी जागरण  से  भी  समझा  जा   सकता  है ।   समयाचारस्वरूपा सात्विक तन्त्ररचना  होने  से  यह  जितनी   विस्तृत रहस्यपरा  है,   उतनी   ही  उपासक  की  संसार भय  से  रक्षा (त्राण)  करने  वाली  भी  है , भगवान् शंकर द्वारा  कथित  एवं   भगवती त्रिपुरा सुन्दरी द्वारा  अनुमोदित  (आगमात्मिका) होने  से अभ्युदय (लौकिक कल्याण) और निःश्रेयस (मोक्ष) की उपायस्वरूपा  है । हालांकि  माँ ललिताम्बा की  उपासना  के  सम्बन्ध  में  सामान्य  धारणा  यह  प्रचलित  है  कि  श्री विद्या सम्प्रदाय के सबल रहने  से    शक्ति उपासना वस्तुतः दक्षिण भारत  में  ही  है  , हालांकि     स्थूल दृष्टि  से  उत्तर भारत  में  श्रीविद्या का  अभाव  सा  दिखलाई  देता  है  इसलिए ये  कह  दिया  जाता है कि   राजराजेश्वरी  माँ त्रिपुरा सुन्दरी की  उपासना  क्षीणप्राय है  तथा  दक्षिण  में  ही  इसका  विस्तार   दृष्टिगोचर  होता  है ,  किन्तु  ऐसा  भी  नहीं  है , क्योंकि  उत्तर  भारत  में  जो माँ राजराजेश्वरी त्रिपुरा सुन्दरी  की  उपासना   है तथा  माता  भगवती  की  प्रत्यक्ष  महिमा  प्रकाशित है  ,   वह दक्षिण  तो  क्या  ,   समस्त  विश्व  में  कहीं  नहीं  ,  यह मर्म  यदि   हम जैसे  अधिकारी    जानते  हैं तो  ये  हमारा  सौभाग्य है  ।  अस्तु ,
१०३ श्लोकों  में  प्रवाहित   यह  शंकर भावधारा  शिखरिणी छन्द में  है ,   जिसमें यगण, मगण, नगण, सगण, भगण और लघु तथा गुरु के क्रम से प्रत्येक चरण में वर्ण रखे जाते हैं और  ६  तथा ११  वर्णों के बाद यति होती है,  जैसा  कि  इसके  लक्षण  में  स्पष्ट  किया  गया  है  :- रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमनसभला गः शिखरिणी ।। (- वृत्तरत्नाकर ३/९०) ।।
सौन्दर्यलहरी  स्वरूपा   माँ  त्रिपुरा सुन्दरी के इस अचिन्त्य  माहात्म्य को  जीवन में अभिन्नभावेन  उतारने  करने से  तो  क्या  कहना  वरन्  इसके पाठ करने से  या  इस के प्रति  श्रद्धा  अभिव्यक्त  करने  मात्र  से  भी  समस्त पुण्य फलीभूत हो  जाते  हैं ।। इत्यो३म् शम् ।।
।।  अथ सौन्दर्यलहरी  ।।

आनन्दलहरी (१-४०)
            ।ऽ       ऽऽ     ऽऽ     ।।    ।।।     ऽऽ     ।।।ऽ             
शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ।
अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरिञ्चादिभिरपि
प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति ।। १।।

तनीयांसं पांसुं तव चरणपङ्केरुहभवं
विरिञ्चिस्सञ्चिन्वन् विरचयति लोकानविकलम् ।
वहत्येनं शौरिः कथमपि सहस्रेण शिरसां
हरस्सङ्क्षुद्यैनं भजति भसितोद्धूलनविधिम् ।। २।।

अविद्यानामन्त-स्तिमिर-मिहिरद्वीपनगरी
जडानां चैतन्य-स्तबक-मकरन्द-स्रुतिझरी ।
दरिद्राणां चिन्तामणिगुणनिका जन्मजलधौ
निमग्नानां दंष्ट्रा मुररिपु-वराहस्य भवति ।। ३।।

त्वदन्यः पाणिभ्यामभयवरदो दैवतगणः
त्वमेका नैवासि प्रकटितवराभीत्यभिनया ।
भयात् त्रातुं दातुं फलमपि च वाञ्छासमधिकं
शरण्ये लोकानां तव हि चरणावेव निपुणौ ।। ४।।

हरिस्त्वामाराध्य प्रणतजनसौभाग्यजननीं
पुरा नारी भूत्वा पुररिपुमपि क्षोभमनयत् ।
स्मरोऽपि त्वां नत्वा रतिनयनलेह्येन वपुषा
मुनीनामप्यन्तः प्रभवति हि मोहाय महताम् ।। ५।।

धनुः पौष्पं मौर्वी मधुकरमयी पञ्च विशिखाः
वसन्तः सामन्तो मलयमरुदायोधनरथः ।
तथाप्येकः सर्वं हिमगिरिसुते कामपि कृपाम्
अपाङ्गात्ते लब्ध्वा जगदिद-मनङ्गो विजयते ।। ६।।

क्वणत्काञ्चीदामा करिकलभकुम्भस्तननता
परिक्षीणा मध्ये परिणतशरच्चन्द्रवदना ।
धनुर्बाणान् पाशं सृणिमपि दधाना करतलैः
पुरस्तादास्तां नः पुरमथितुराहोपुरुषिका ।। ७।।

सुधासिन्धोर्मध्ये सुरविटपिवाटीपरिवृते
मणिद्वीपे नीपोपवनवति चिन्तामणिगृहे ।
शिवाकारे मञ्चे परमशिवपर्यङ्कनिलयां
भजन्ति त्वां धन्याः कतिचन चिदानन्दलहरीम् ।। ८।।

महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं
स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदि मरुतमाकाशमुपरि ।
मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्वा कुलपथं
सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसे ।। ९।।

सुधाधारासारैश्चरणयुगलान्तर्विगलितैः
प्रपञ्चं सिञ्चन्ती पुनरपि रसाम्नायमहसः ।
अवाप्य स्वां भूमिं भुजगनिभमध्युष्टवलयं
स्वमात्मानं कृत्वा स्वपिषि कुलकुण्डे कुहरिणि ।। १०।।

चतुर्भिः श्रीकण्ठैः शिवयुवतिभिः पञ्चभिरपि
प्रभिन्नाभिः शम्भोर्नवभिरपि मूलप्रकृतिभिः ।
चतुश्चत्वारिंशद्वसुदलकलाश्रत्रिवलय-
त्रिरेखाभिः सार्धं तव शरणकोणाः परिणताः ।। ११।।

त्वदीयं सौन्दर्यं तुहिनगिरिकन्ये तुलयितुं
कवीन्द्राः कल्पन्ते कथमपि विरिञ्चिप्रभृतयः ।
यदालोकौत्सुक्यादमरललना यान्ति मनसा
तपोभिर्दुष्प्रापामपि गिरिशसायुज्यपदवीम् ।। १२।।

नरं वर्षीयांसं नयनविरसं नर्मसु जडं
तवापाङ्गालोके पतितमनुधावन्ति शतशः ।
गलद्वेणीबन्धाः कुचकलशविस्रस्तसिचया
हठात् त्रुट्यत्काञ्च्यो विगलितदुकूला युवतयः ।। १३।।

क्षितौ षट्पञ्चाशद् द्विसमधिकपञ्चाशदुदके
हुताशे द्वाषष्टिश्चतुरधिकपञ्चाशदनिले ।
दिवि द्विष्षट्त्रिंशन्मनसि च चतुष्षष्टिरिति ये
मयूखास्तेषामप्युपरि तव पादाम्बुजयुगम् ।। १४।।

शरज्ज्योत्स्नाशुद्धां शशियुतजटाजूटमकुटां
वरत्रासत्राणस्फटिकघटिकापुस्तककराम् ।
सकृन्न त्वा नत्वा कथमिव सतां संन्निदधते
मधुक्षीरद्राक्षामधुरिमधुरीणाः भणितयः ।। १५।। 

कवीन्द्राणां चेतःकमलवनबालातपरुचिं
भजन्ते ये सन्तः कतिचिदरुणामेव भवतीम् ।
विरिञ्चिप्रेयस्यास्तरुणतरशृङ्गारलहरी-
गभीराभिर्वाग्भिर्विदधति सतां रञ्जनममी ।। १६।।

सवित्रीभिर्वाचां शशिमणिशिलाभङ्गरुचिभिः
वशिन्याद्याभिस्त्वां सह जननि सञ्चिन्तयति यः ।
स कर्ता काव्यानां भवति महतां भङ्गिरुचिभिः
वचोभिर्वाग्देवीवदनकमलामोदमधुरैः ।। १७।।

तनुच्छायाभिस्ते तरुणतरणिश्रीसरणिभिः
दिवं सर्वामुर्वीमरुणिमनि मग्नां स्मरति यः ।
भवन्त्यस्य त्रस्यद्वनहरिणशालीननयनाः
सहोर्वश्या वश्याः कति कति न गीर्वाणगणिकाः ।। १८।।

मुखं बिन्दुं कृत्वा कुचयुगमधस्तस्य तदधो
हरार्धं ध्यायेद्यो हरमहिषि ते मन्मथकलाम् ।
स सद्यः सङ्क्षोभं नयति वनिता इत्यतिलघु
त्रिलोकीमप्याशु भ्रमयति रवीन्दुस्तनयुगाम् ।। १९।।

किरन्तीमङ्गेभ्यः किरणनिकुरम्बामृतरसं
हृदि त्वामाधत्ते हिमकरशिलामूर्तिमिव यः ।
स सर्पाणां दर्पं शमयति शकुन्ताधिप इव
ज्वरप्लुष्टान् दृष्ट्या सुखयति सुधाधारसिरया ।। २०।।

तटिल्लेखातन्वीं तपनशशिवैश्वानरमयीं
निषण्णां षण्णामप्युपरि कमलानां तव कलाम् ।
महापद्माटव्यां मृदितमलमायेन मनसा
महान्तः पश्यन्तो दधति परमाह्लादलहरीम् ।। २१।।

भवानि त्वं दासे मयि वितर दृष्टिं सकरुणा-
मिति स्तोतुं वाञ्छन् कथयति भवानि त्वमिति यः ।
तदैव त्वं तस्मै दिशसि निजसायुज्यपदवीं
मुकुन्दब्रह्मेन्द्रस्फुटमकुटनीराजितपदाम् ।। २२।।

त्वया हृत्वा वामं वपुरपरितृप्तेन मनसा
शरीरार्धं शम्भोरपरमपि शङ्के हृतमभूत् ।
यदेतत्त्वद्रूपं सकलमरुणाभं त्रिनयनं
कुचाभ्यामानम्रं कुटिलशशिचूडालमकुटम् ।। २३।।

जगत्सूते धाता हरिरवति रुद्रः क्षपयते
तिरस्कुर्वन्नेतत्स्वमपि वपुरीशस्तिरयति ।
सदापूर्वः सर्वं तदिदमनुगृह्णाति च शिव-
स्तवाज्ञामालम्ब्य क्षणचलितयोर्भ्रूलतिकयोः ।। २४।।

त्रयाणां देवानां त्रिगुणजनितानां तव शिवे
भवेत् पूजा पूजा तव चरणयोर्या विरचिता ।
तथा हि त्वत्पादोद्वहनमणिपीठस्य निकटे
स्थिता ह्येते शश्वन्मुकुलितकरोत्तंसमकुटाः ।। २५।।

विरिञ्चिः पञ्चत्वं व्रजति हरिराप्नोति विरतिं
विनाशं कीनाशो भजति धनदो याति निधनम् ।
वितन्द्री माहेन्द्री विततिरपि संमीलितदृशा
महासंहारेऽस्मिन् विहरति सति त्वत्पतिरसौ ।। २६।।

जपो जल्पः शिल्पं सकलमपि मुद्राविरचना
गतिः प्रादक्षिण्यक्रमणमशनाद्याहुतिविधिः ।
प्रणामस्संवेशस्सुखमखिलमात्मार्पणदृशा
सपर्यापर्यायस्तव भवतु यन्मे विलसितम् ।। २७।।

सुधामप्यास्वाद्य प्रतिभयजरामृत्युहरिणीं
विपद्यन्ते विश्वे विधिशतमखाद्या दिविषदः ।
करालं यत्क्ष्वेलं कबलितवतः कालकलना
न शम्भोस्तन्मूलं तव जननि ताटङ्कमहिमा ।। २८।।

किरीटं वैरिञ्चं परिहर पुरः कैटभभिदः
कठोरे कोटीरे स्खलसि जहि जम्भारिमुकुटम् ।
प्रणम्रेष्वेतेषु प्रसभमुपयातस्य भवनं
भवस्याभ्युत्थाने तव परिजनोक्तिर्विजयते ।। २९।।

स्वदेहोद्भूताभिर्घृणिभिरणिमाद्याभिरभितो
निषेव्ये नित्ये त्वामहमिति सदा भावयति यः ।
किमाश्चर्यं तस्य त्रिनयनसमृद्धिं तृणयतो
महासंवर्ताग्निर्विरचयति निराजनविधिम् ।। ३०।।

चतुष्षष्ट्या तन्त्रैः सकलमतिसन्धाय भुवनं
स्थितस्तत्तत्सिद्धिप्रसवपरतन्त्रैः पशुपतिः ।
पुनस्त्वन्निर्बन्धादखिलपुरुषार्थैकघटना-
स्वतन्त्रं ते तन्त्रं क्षितितलमवातीतरदिदम् ।। ३१।।

शिवः शक्तिः कामः क्षितिरथ रविः शीतकिरणः
स्मरो हंसः शक्रस्तदनु च परामारहरयः ।
अमी हृल्लेखाभिस्तिसृभिरवसानेषु घटिता
भजन्ते वर्णास्ते तव जननि नामावयवताम् ।। ३२।।

स्मरं योनिं लक्ष्मीं त्रितयमिदमादौ तव मनो-
र्निधायैके नित्ये निरवधिमहाभोगरसिकाः ।
भजन्ति त्वां चिन्तामणिगुननिबद्धाक्षवलयाः
शिवाग्नौ जुह्वन्तः सुरभिघृतधाराहुतिशतैः ।। ३३।।

शरीरं त्वं शम्भोः शशिमिहिरवक्षोरुहयुगं
तवात्मानं मन्ये भगवति नवात्मानमनघम् ।
अतश्शेषश्शेषीत्ययमुभयसाधारणतया
स्थितः सम्बन्धो वां समरसपरानन्दपरयोः ।। ३४।।

मनस्त्वं व्योम त्वं मरुदसि मरुत्सारथिरसि
त्वमापस्त्वं भूमिस्त्वयि परिणतायां न हि परम् ।
त्वमेव स्वात्मानं परिणमयितुं विश्ववपुषा
चिदानन्दाकारं शिवयुवति भावेन बिभृषे ।। ३५।।

तवाज्ञाचक्रस्थं तपनशशिकोटिद्युतिधरं
परं शम्भुं वन्दे परिमिलितपार्श्वं परचिता ।
यमाराध्यन् भक्त्या रविशशिशुचीनामविषये
निरालोकेऽलोके निवसति हि भालोकभवने ।। ३६।।

विशुद्धौ ते शुद्धस्फटिकविशदं व्योमजनकं
शिवं सेवे देवीमपि शिवसमानव्यवसिताम् ।
ययोः कान्त्या यान्त्याः शशिकिरणसारूप्यसरणे-
विधूतान्तर्ध्वान्ता विलसति चकोरीव जगती ।। ३७।।

समुन्मीलत् संवित् कमलमकरन्दैकरसिकं
भजे हंसद्वन्द्वं किमपि महतां मानसचरम् ।
यदालापादष्टादशगुणितविद्यापरिणति-
र्यदादत्ते दोषाद् गुणमखिलमद्भ्यः पय इव ।। ३८।।

तव स्वाधिष्ठाने हुतवहमधिष्ठाय निरतं
तमीडे संवर्तं जननि महतीं तां च समयाम् ।
यदालोके लोकान् दहति महति क्रोधकलिते
दयार्द्रा या दृष्टिः शिशिरमुपचारं रचयति ।। ३९।।

तटित्त्वन्तं शक्त्या तिमिरपरिपन्थिफुरणया
स्फुरन्नानारत्नाभरणपरिणद्धेन्द्रधनुषम् ।
तव श्यामं मेघं कमपि मणिपूरैकशरणं
निषेवे वर्षन्तं हरमिहिरतप्तं त्रिभुवनम् ।। ४०।।

तवाधारे मूले सह समयया लास्यपरया
नवात्मानं मन्ये नवरसमहाताण्डवनटम् ।
उभाभ्यामेताभ्यामुदयविधिमुद्दिश्य दयया
सनाथाभ्यां जज्ञे जनकजननीमज्जगदिदम् ।। ४१।।

सौन्दर्यलहरी

गतैर्माणिक्यत्वं गगनमणिभिः सान्द्रघटितं
किरीटं ते हैमं हिमगिरिसुते कीर्तयति यः ।
स नीडेयच्छायाच्छुरणशबलं चन्द्रशकलं
धनुः शौनासीरं किमिति न निबध्नाति धिषणाम् ।। ४२।।

धुनोतु ध्वान्तं नस्तुलितदलितेन्दीवरवनं
घनस्निग्धश्लक्ष्णं चिकुरनिकुरुम्बं तव शिवे ।
यदीयं सौरभ्यं सहजमुपलब्धुं सुमनसो
वसन्त्यस्मिन् मन्ये वलमथनवाटीविटपिनाम् ।। ४३।।

तनोतु क्षेमं नस्तव वदनसौन्दर्यलहरी-
परीवाहस्रोतःसरणिरिव सीमन्तसरणिः ।
वहन्ती सिन्दूरं प्रबलकबरीभारतिमिर-
द्विषां बृन्दैर्बन्दीकृतमिव नवीनार्ककिरणम् ।। ४४।।

अरालैः स्वाभाव्यादलिकलभसश्रीभिरलकैः
परीतं ते वक्त्रं परिहसति पङ्केरुहरुचिम् ।
दरस्मेरे यस्मिन् दशनरुचिकिञ्जल्करुचिरे
सुगन्धौ माद्यन्ति स्मरदहनचक्षुर्मधुलिहः ।। ४५।।

ललाटं लावण्यद्युतिविमलमाभाति तव य-
द्द्वितीयं तन्मन्ये मकुटघटितं चन्द्रशकलम् ।
विपर्यासन्यासादुभयमपि सम्भूय च मिथः
सुधालेपस्यूतिः परिणमति राकाहिमकरः ।। ४६।।

भ्रुवौ भुग्ने किञ्चिद्भुवनभयभङ्गव्यसनिनि
त्वदीये नेत्राभ्यां मधुकररुचिभ्यां धृतगुणम् ।
धनुर्मन्ये सव्येतरकरगृहीतं रतिपतेः
प्रकोष्ठे मुष्टौ च स्थगयति निगूढान्तरमुमे ।। ४७।।

अहः सूते सव्यं तव नयनमर्कात्मकतया
त्रियामां वामं ते सृजति रजनीनायकतया ।
तृतीया ते दृष्टिर्दरदलितहेमाम्बुजरुचिः
समाधत्ते सन्ध्यां दिवसनिशयोरन्तरचरीम् ।। ४८।।

विशाला कल्याणी स्फुटरुचिरयोध्या कुवलयैः
कृपाधाराधारा किमपि मधुराभोगवतिका ।
अवन्ती दृष्टिस्ते बहुनगरविस्तारविजया
ध्रुवं तत्तन्नामव्यवहरणयोग्या विजयते ।। ४९।।

कवीनां सन्दर्भस्तबकमकरन्दैकरसिकं
कटाक्षव्याक्षेपभ्रमरकलभौ कर्णयुगलम् ।
अमुञ्चन्तौ दृष्ट्वा तव नवरसास्वादतरला-
वसूयासंसर्गादलिकनयनं किञ्चिदरुणम् ।। ५०।।

शिवे शृङ्गारार्द्रा तदितरजने कुत्सनपरा
सरोषा गङ्गायां गिरिशचरिते विस्मयवती ।
हराहिभ्यो भीता सरसिरुहसौभाग्यजयिनी
सखीषु स्मेरा ते मयि जननी दृष्टिः सकरुणा ।। ५१।।

गते कर्णाभ्यर्णं गरुत इव पक्ष्माणि दधती
पुरां भेत्तुश्चित्तप्रशमरसविद्रावणफले ।
इमे नेत्रे गोत्राधरपतिकुलोत्तंसकलिके
तवाकर्णाकृष्टस्मरशरविलासं कलयतः ।। ५२।।

विभक्तत्रैवर्ण्यं व्यतिकरितलीलाञ्जनतया
विभाति त्वन्नेत्रत्रितयमिदमीशानदयिते ।
पुनः स्रष्टुं देवान् द्रुहिणहरिरुद्रानुपरतान्
रजः सत्त्वं बिभ्रत्तम इति गुणानां त्रयमिव ।। ५३।।

पवित्रीकर्तुं नः पशुपतिपराधीनहृदये
दयामित्रैर्नेत्रैररुणधवलश्यामरुचिभिः ।
नदः शोणो गङ्गा तपनतनयेति ध्रुवममुं
त्रयाणां तीर्थानामुपनयसि सम्भेदमनघम् ।। ५४।।

निमेषोन्मेषाभ्यां प्रलयमुदयं याति जगती
तवेत्याहुः सन्तो धरणिधरराजन्यतनये ।
त्वदुन्मेषाज्जातं जगदिदमशेषं प्रलयतः
परित्रातुं शङ्के परिहृतनिमेषास्तव दृशः ।। ५५।।

तवापर्णे कर्णेजपनयनपैशुन्यचकिता
निलीयन्ते तोये नियतमनिमेषाः शफरिकाः ।
इयं च श्रीर्बद्धच्छदपुटकवाटं कुवलयम्
जहाति प्रत्यूषे निशि च विघटय्य प्रविशति ।। ५६।।

दृशा द्राघीयस्या दरदलितनीलोत्पलरुचा
दवीयांसं दीनं स्नपय कृपया मामपि शिवे ।
अनेनायं धन्यो भवति न च ते हानिरियता
वने वा हर्म्ये वा समकरनिपातो हिमकरः ।। ५७।।

अरालं ते पालीयुगलमगराजन्यतनये
न केषामाधत्ते कुसुमशरकोदण्डकुतुकम् ।
तिरश्चीनो यत्र श्रवणपथमुल्लङ्घ्य विलस-
न्नपाङ्गव्यासङ्गो दिशति शरसन्धानधिषणाम् ।। ५८।।

स्फुरद्गण्डाभोगप्रतिफलितताटङ्कयुगलं
चतुश्चक्रं मन्ये तव मुखमिदं मन्मथरथम् ।
यमारुह्य द्रुह्यत्यवनिरथमर्केन्दुचरणं
महावीरो मारः प्रमथपतये सज्जितवते ।। ५९।।

सरस्वत्याः सूक्तीरमृतलहरीकौशलहरीः
पिबन्त्याः शर्वाणि श्रवणचुलुकाभ्यामविरलम् ।
चमत्कारश्लाघाचलितशिरसः कुण्डलगणो
झणत्कारैस्तारैः प्रतिवचनमाचष्ट इव ते ।। ६०।।

असौ नासावंशस्तुहिनगिरिवंशध्वजपटि
त्वदीयो नेदीयः फलतु फलमस्माकमुचितम् ।
वहन्नन्तर्मुक्ताः शिशिरतरनिश्वासगलितं
समृद्ध्या यत्तासां बहिरपि च मुक्तामणिधरः ।। ६१।।

प्रकृत्या रक्तायास्तव सुदति दन्तच्छदरुचेः
प्रवक्ष्ये सादृश्यं जनयतु फलं विद्रुमलता ।
न बिम्बं तद्बिम्बप्रतिफलनरागादरुणितं
तुलामध्यारोढुं कथमिव विलज्जेत कलया ।। ६२।।

स्मितज्योत्स्नाजालं तव वदनचन्द्रस्य पिबतां
चकोराणामासीदतिरसतया चञ्चुजडिमा ।
अतस्ते शीतांशोरमृतलहरीमम्लरुचयः
पिबन्ति स्वच्छन्दं निशि निशि भृशं काञ्जिकधिया ।। ६३।।

अविश्रान्तं पत्युर्गुणगणकथाम्रेडनजपा
जपापुष्पच्छाया तव जननि जिह्वा जयति सा ।
यदग्रासीनायाः स्फटिकदृषदच्छच्छविमयी
सरस्वत्या मूर्तिः परिणमति माणिक्यवपुषा ।। ६४।।

रणे जित्वा दैत्यानपहृतशिरस्त्रैः कवचिभिर्-
निवृत्तैश्चण्डांशत्रिपुरहरनिर्माल्यविमुखैः ।
विशाखेन्द्रोपेन्द्रैः शशिविशदकर्पूरशकला
विलीयन्ते मातस्तव वदनताम्बूलकबलाः ।। ६५।।

विपञ्च्या गायन्ती विविधमपदानं पशुपतेः
त्वयारब्धे वक्तुं चलितशिरसा साधुवचने ।
तदीयैर्माधुर्यैरपलपिततन्त्रीकलरवां
निजां वीणां वाणी निचुलयति चोलेन निभृतम् ।। ६६।।

कराग्रेण स्पृष्टं तुहिनगिरिणा वत्सलतया
गिरीशेनोदस्तं मुहुरधरपानाकुलतया ।
करग्राह्यं शम्भोर्मुखमुकुरवृन्तं गिरिसुते
कथङ्कारं ब्रूमस्तव चिबुकमौपम्यरहितम् ।। ६७।।

भुजाश्लेषान् नित्यं पुरदमयितुः कण्टकवती
तव ग्रीवा धत्ते मुखकमलनालश्रियमियम् ।
स्वतः श्वेता कालागुरुबहुलजम्बालमलिना
मृणालीलालित्यम् वहति यदधो हारलतिका ।। ६८।।

गले रेखास्तिस्रो गतिगमकगीतैकनिपुणे
विवाहव्यानद्धप्रगुणगुणसङ्ख्याप्रतिभुवः ।
विराजन्ते नानाविधमधुररागाकरभुवां
त्रयाणां ग्रामाणां स्थितिनियमसीमान इव ते ।। ६९।।

मृणालीमृद्वीनां तव भुजलतानां चतसृणां
चतुर्भिः सौन्दर्यं सरसिजभवः स्तौति वदनैः ।
नखेभ्यः सन्त्रस्यन् प्रथममथनादन्धकरिपो-
श्चतुर्णां शीर्षाणां सममभयहस्तार्पणधिया ।। ७०।।

नखानामुद्द्योतैर्नवनलिनरागं विहसतां
कराणां ते कान्तिं कथय कथयामः कथमुमे ।
कयाचिद्वा साम्यं भजतु कलया हन्त कमलं
यदि क्रीडल्लक्ष्मीचरणतललाक्षारसछणम् ।। ७१।।

समं देवि स्कन्दद्विपवदनपीतं स्तनयुगं
तवेदं नः खेदं हरतु सततं प्रस्नुतमुखम् ।
यदालोक्याशङ्काकुलितहृदयो हासजनकः
स्वकुम्भौ हेरम्बः परिमृशति हस्तेन झडिति ।। ७२।।

अमू ते वक्षोजावमृतरसमाणिक्यकुतुपौ
न सन्देहस्पन्दो नगपतिपताके मनसि नः ।
पिबन्तौ तौ यस्मादविदितवधूसङ्गरसिकौ
कुमारावद्यापि द्विरदवदनक्रौञ्चदलनौ ।। ७३।।

वहत्यम्ब स्तम्बेरमदनुजकुम्भप्रकृतिभिः
समारब्धां मुक्तामणिभिरमलां हारलतिकाम् ।
कुचाभोगो बिम्बाधररुचिभिरन्तः शबलितां
प्रतापव्यामिश्रां पुरदमयितुः कीर्तिमिव ते ।। ७४।।

तव स्तन्यं मन्ये धरणिधरकन्ये हृदयतः
पयःपारावारः परिवहति सारस्वतमिव ।
दयावत्या दत्तं द्रविडशिशुरास्वाद्य तव यत्
कवीनां प्रौढानामजनि कमनीयः कवयिता ।। ७५।।

हरक्रोधज्वालावलिभिरवलीढेन वपुषा
गभीरे ते नाभीसरसि कृतसङ्गो मनसिजः ।
समुत्तस्थौ तस्मादचलतनये धूमलतिका
जनस्तां जानीते तव जननि रोमावलिरिति ।। ७६।।

यदेतत् कालिन्दीतनुतरतरङ्गाकृति शिवे
कृशे मध्ये किञ्चिज्जननि तव यद्भाति सुधियाम् ।
विमर्दादन्योऽन्यं कुचकलशयोरन्तरगतं
तनूभूतं व्योम प्रविशदिव नाभिं कुहरिणीम् ।। ७७।।

स्थिरो गङ्गावर्तः स्तनमुकुलरोमावलिलता-
कलावालं कुण्डं कुसुमशरतेजोहुतभुजः ।
रतेर्लीलागारं किमपि तव नाभिर्गिरिसुते
बिलद्वारं सिद्धेर्गिरिशनयनानां विजयते ।। ७८।।

निसर्गक्षीणस्य स्तनतटभरेण क्लमजुषो
नमन्मूर्तेर्नारीतिलक शनकैस्त्रुट्यत इव ।
चिरं ते मध्यस्य त्रुटिततटिनीतीरतरुणा
समावस्थास्थेम्नो भवतु कुशलं शैलतनये ।। ७९।।

कुचौ सद्यःस्विद्यत्तटघटितकूर्पासभिदुरौ
कषन्तौ दोर्मूले कनककलशाभौ कलयता ।
तव त्रातुं भङ्गादलमिति वलग्नं तनुभुवा
त्रिधा नद्धं देवि त्रिवलि लवलीवल्लिभिरिव ।। ८०।।

गुरुत्वं विस्तारं क्षितिधरपतिः पार्वति निजा-
न्नितम्बादाच्छिद्य त्वयि हरणरूपेण निदधे ।
अतस्ते विस्तीर्णो गुरुरयमशेषां वसुमतीं
नितम्बप्राग्भारः स्थगयति लघुत्वं नयति च ।। ८१।।

करीन्द्राणां शुण्डान् कनककदलीकाण्डपटली-
मुभाभ्यामूरुभ्यामुभयमपि निर्जित्य भवती ।
सुवृत्ताभ्यां पत्युः प्रणतिकठिनाभ्यां गिरिसुते
विधिज्ञ्ये जानुभ्यां विबुधकरिकुम्भद्वयमसि ।। ८२।।

पराजेतुं रुद्रं द्विगुणशरगर्भौ गिरिसुते
निषङ्गौ जङ्घे ते विषमविशिखो बाढमकृत ।
यदग्रे दृश्यन्ते दशशरफलाः पादयुगली-
नखाग्रच्छद्मानः सुरमकुटशाणैकनिशिताः ।। ८३।।

श्रुतीनां मूर्धानो दधति तव यौ शेखरतया
ममाप्येतौ मातः शिरसि दयया धेहि चरणौ ।
ययोः पाद्यं पाथः पशुपतिजटाजूटतटिनी
ययोर्लाक्षालक्ष्मीररुणहरिचूडामणिरुचिः ।। ८४।।

नमोवाकं ब्रूमो नयनरमणीयाय पदयो-
स्तवास्मै द्वन्द्वाय स्फुटरुचिरसालक्तकवते ।
असूयत्यत्यन्तं यदभिहननाय स्पृहयते
पशूनामीशानः प्रमदवनकङ्केलितरवे ।। ८५।।

मृषा कृत्वा गोत्रस्खलनमथ वैलक्ष्यनमितं
ललाटे भर्तारं चरणकमले ताडयति ते ।
चिरादन्तःशल्यं दहनकृतमुन्मूलितवता
तुलाकोटिक्वाणैः किलिकिलितमीशानरिपुणा ।। ८६।।

हिमानीहन्तव्यं हिमगिरिनिवासैकचतुरौ
निशायां निद्राणं निशि चरमभागे च विशदौ ।
वरं लक्ष्मीपात्रं श्रियमतिसृजन्तौ समयिनां
सरोजं त्वत्पादौ जननि जयतश्चित्रमिह किम् ।। ८७।।

पदं ते कीर्तीनां प्रपदमपदं देवि विपदां
कथं नीतं सद्भिः कठिनकमठीकर्परतुलाम् ।
कथं वा बाहुभ्यामुपयमनकाले पुरभिदा
यदादाय न्यस्तं दृषदि दयमानेन मनसा ।। ८८।।

नखैर्नाकस्त्रीणां करकमलसङ्कोचशशिभि-
स्तरूणां दिव्यानां हसत इव ते चण्डि चरणौ ।
फलानि स्वःस्थेभ्यः किसलयकराग्रेण ददतां
दरिद्रेभ्यो भद्रां श्रियमनिशमह्नाय ददतौ ।। ८९।।

ददाने दीनेभ्यः श्रियमनिशमाशानुसदृशी-
ममन्दं सौन्दर्यप्रकरमकरन्दम् विकिरति ।
तवास्मिन् मन्दारस्तबकसुभगे यातु चरणे
निमज्जन्मज्जीवः करणचरणः षट्चरणताम् ।। ९०।।

पदन्यासक्रीडापरिचयमिवारब्धुमनसः
स्खलन्तस्ते खेलं भवनकलहंसा न जहति ।
अतस्तेषां शिक्षां सुभगमणिमञ्जीररणित-
च्छलादाचक्षाणं चरणकमलं चारुचरिते ।। ९१।।

गतास्ते मञ्चत्वं द्रुहिणहरिरुद्रेश्वरभृतः
शिवः स्वच्छच्छायाघटितकपटप्रच्छदपटः ।
त्वदीयानां भासां प्रतिफलनरागारुणतया
शरीरी शृङ्गारो रस इव दृशां दोग्धि कुतुकम् ।। ९२।।

अराला केशेषु प्रकृतिसरला मन्दहसिते
शिरीषाभा चित्ते दृषदुपलशोभा कुचतटे ।
भृशं तन्वी मध्ये पृथुरुरसिजारोहविषये
जगत्त्रातुं शम्भोर्जयति करुणा काचिदरुणा ।। ९३।।

कलङ्कः कस्तूरी रजनिकरबिम्बं जलमयं
कलाभिः कर्पूरैर्मरकतकरण्डं निबिडितम् ।
अतस्त्वद्भोगेन प्रतिदिनमिदं रिक्तकुहरं
विधिर्भूयो भूयो निबिडयति नूनं तव कृते ।। ९४।।

पुरारातेरन्तःपुरमसि ततस्त्वच्चरणयोः
सपर्यामर्यादा तरलकरणानामसुलभा ।
तथा ह्येते नीताः शतमखमुखाः सिद्धिमतुलां
तव द्वारोपान्तस्थितिभिरणिमाद्याभिरमराः ।। ९५।।

कलत्रं वैधात्रं कतिकति भजन्ते न कवयः
श्रियो देव्याः को वा न भवति पतिः कैरपि धनैः ।
महादेवं हित्वा तव सति सतीनामचरमे
कुचाभ्यामासङ्गः कुरवकतरोरप्यसुलभः ।। ९६।।

गिरामाहुर्देवीं द्रुहिणगृहिणीमागमविदो
हरेः पत्नीं पद्मां हरसहचरीमद्रितनयाम् ।
तुरीया कापि त्वं दुरधिगमनिःसीममहिमा
महामाया विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषि ।। ९७।।

कदा काले मातः कथय कलितालक्तकरसं
पिबेयं विद्यार्थी तव चरणनिर्णेजनजलम् ।
प्रकृत्या मूकानामपि च कविताकारणतया
कदा धत्ते वाणीमुखकमलताम्बूलरसताम् ।। ९८।।

सरस्वत्या लक्ष्म्या विधिहरिसपत्नो विहरते
रतेः पातिव्रत्यं शिथिलयति रम्येण वपुषा ।
चिरं जीवन्नेव क्षपितपशुपाशव्यतिकरः
परानन्दाभिख्यम् रसयति रसं त्वद्भजनवान् ।। ९९।।

प्रदीपज्वालाभिर्दिवसकरनीराजनविधिः
सुधासूतेश्चन्द्रोपलजललवैरर्घ्यरचना ।
स्वकीयैरम्भोभिः सलिलनिधिसौहित्यकरणं
त्वदीयाभिर्वाग्भिस्तव जननि वाचां स्तुतिरियम् ।। १००।।

समानीतः पद्भ्यां मणिमुकुरतामम्बरमणि-
र्भयादन्तःस्तिमितकिरणश्रेणिमसृणः ।
दधाति त्वद्वक्त्रम्प्रतिफलनमश्रान्तविकचं
निरातङ्कं चन्द्रान्निजहृदयपङ्केरुहमिव ।। १०१।।

समुद्भूतस्थूलस्तनभरमुरश्चारु हसितं
कटाक्षे कन्दर्पः कतिचन कदम्बद्युति वपुः ।
हरस्य त्वद्भ्रान्तिं मनसि जनयाम् स्म विमला
भवत्या ये भक्ताः परिणतिरमीषामियमुमे ।। १०२।। 

निधे नित्यस्मेरे निरवधिगुणे नीतिनिपुणे
निराघातज्ञाने नियमपरचित्तैकनिलये ।
नियत्या निर्मुक्ते निखिलनिगमान्तस्तुतिपदे
निरातङ्के नित्ये निगमय ममापि स्तुतिमिमाम् ।। १०३।।

।। इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ सौन्दर्यलहरी सम्पूर्णा ।।

।। ॐ तत्सत् ।।
धर्म की जय हो !
अधर्म का नाश हो !
प्राणियों में सद्भावना हो !
विश्व का कल्याण हो !

गोमाता की जय हो !
हर हर महादेव !
।। जय श्री राम ।।

सायंकाल शृंगार दर्शन श्री सोमनाथ महादेव


दो पीठ पर एक शंकराचार्य


स्वयं चतुर्मुख ब्रह्मा भी साक्षात् अवतरित हो जाएँ , तो वे भी दो पीठ पर एक शंकराचार्य का अभिषिक्त होना सही सिद्ध नहीं कर ...

Posted by Dharamsamrat Swami Karpatri Ji on Sunday, November 1, 2015

परब्रह्म परमात्मा का आदेश


परब्रह्म परमात्मा का आदेश -हे मनुष्यों ! तुम देवताओं को दो , देवता तुमको देंगे , इस प्रकार वे देवता और तुम मनुष्य - दोनों क्रमशः मोक्ष को पा लो !( -गीता ३/११)|| जयश्रीराम |

Posted by Dharamsamrat Swami Karpatri Ji on Saturday, October 31, 2015

शनिवार, 31 अक्टूबर 2015

परमात्मा साकार है या निराकार ?


परमात्मा साकार है या निराकार ?यहाँ विचार्य ये है कि एक ही वस्तु साकार और निराकार एक साथ कैसे हो सकती है ?कतिपय विद्व...

Posted by Dharamsamrat Swami Karpatri Ji on Saturday, October 31, 2015

दर्शन गुरु देव श्री कारपात्री


Sai Baba a saint only

#साईं_बाबा के प्रसंग पर ऐसा वक्तव्य (बयान) होना चाहिए -हे मनुष्यों ! आपके व्यक्तिगत पूज्य तो बहुत हो सकते हैं , जो आपक...

Posted by Dharamsamrat Swami Karpatri Ji on Friday, October 30, 2015

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

सर्व वेदांत सार: ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः ||

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः ||यहाँ आये हुए "जगन्मिथ्या" वाक्यांश में मिथ्या का अर्थ झूठ (अभावस्वरूप ) ...

Posted by Dharamsamrat Swami Karpatri Ji on Friday, October 30, 2015

अद्वैतमते भक्तिः

तदा पुमान् मुक्तसमस्तबन्धनस्तद्भावभावानुकृताशया कृतिः।
निर्दग्धबीजानुशयो महीयसा भक्तिप्रयोगेण समेत्यधोक्षजम्।। (-श्रीमद्भा०७/७/३६)
श्रीमद्भगवद्गीतायां भगवता भक्तेरधिकारी चतुर्विधः प्रोक्तः-
चतुर्विधा भजन्ते मां जनासुकृतीनोऽर्जुन।
आर्तोजिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।। (-श्रीमद्भगव० ७ /१६ )
तत्र ज्ञानयुतो  विशुद्धान्तःकरणो वासनारहितश्च  पुरुषः भक्तेरधिकारी भवति। (तेषां ज्ञानी नित्ययुक्तः० इति गीतायाम् ) यावत् भोगस्य मोक्षस्य वा हृदि स्पृहा भवति तावत्  सम्यग्व्यवसिता भक्तेरभ्युदयो न भवति।
श्रीकृष्णचरणारविन्दयोः सेवया निर्मलचेतषां भक्तानां भवमुक्तिविषयेsपि  कदापि स्पृहा न भवति। इत्थं भवमुक्तिः भक्तेभ्यः त्याज्यतया एव शास्त्रे निरूपिता परं सालोक्य-सारूप्य-सायुज्य-सामीप्यरूपा मुक्तिः भक्तिविरोधिनी न भवति।
‘मोक्षसाधनसामग्य्रां भक्तिरेव गरीयसि (वि.चू.) इति वदद्भिः श्रीमच्छङ्कराचार्यैः भक्तेर्मुक्त्युपायत्वं कण्ठत एवाघोषितम् । अद्वैतमते  भज्- सेवायाम् इति धातुना निष्पन्नो भक्तिशब्दः सेव्यसेवकसापेक्षस्सन् जीवब्रह्मणोर्व्यावहारिकभेदं प्रतिपादयति । तथाहि  –
सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम्। सामुद्रो हि तरंगः क्वचन समुद्रो न तारंगः ।। इति ।।
अथापि श्रीमच्छङ्कराचार्यैः –
‘स्वस्वरुपानुसन्धानं भक्तिरित्युच्यते बुधैः इति (विवेकचू०) । अनेन चैतन्याभेदविज्ञप्तिरेव भक्तेरवसानत्वेन वर्तते  क्षेत्रज्ञेश्वरयोरभेदत्वात् ।
एवमाश्रित्य श्रीमन्मधुसूदनस्वामिभिरपि भक्तेः मार्मिकी व्याख्या एवं प्रकारेण कृता –
द्रुते चित्ते प्रविष्टा या गोविन्दाकारता स्थिरा ।
सा भक्तिरित्यभिहिता विशेषस्त्वधुनोच्यते ॥ इति भक्तिरसायने २/१
भगवद्भक्तिप्राप्तये जाति-कुल-गुण-रूप-विद्या धनादीनामपेक्षा नास्ति, केवलं भगवति प्रेमोत्कर्ष एवापेक्षिता भवति। सर्वकामनाहीनो भगवत्यनुरक्तो जनः सर्वतो भावेन भगवतः कामना  एव करोति ,   सैव भक्तिरूच्यते। सिद्धान्ततः विष्णुश्रीकृष्णयोः भेदो नास्ति परं भक्तिसाम्राज्ये ऐश्वर्यप्रधानविष्णुस्वरूपाऽपेक्षया माधुर्यप्रधानकृष्णरूपे आकर्षणस्य वैशिष्ट्यं वर्तते। अतः श्रीमन्मधुसूदनस्वामिभिरुच्यन्ते –
तज्जन्यायां द्रुतौ चित्ते या स्याच्छ्रीकृष्णनिष्ठता ।
सम्भोगविप्रयोगाख्या रतिस्सा सा क्रमाद् भवेत् ।। -भक्तिरसायनम् २/४
।। जय श्रीराम ।।

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

|| ब्रह्मगणित ||

बुधवार, 28 अक्टूबर 2015

सनातन तीर्थ श्री नागेशी मंदिर, बंडोरा, फोंडा, गोआ, भारत

Location of the templeThis Temple is dedicated to Lord Shiva, the temple is situated in Bandora village, about four...

Posted by Bipin Chauhan on Sunday, October 25, 2015

सनातन तीर्थ श्री मंगेशी मंदिर, प्रिओल, फोंडा, गोआ, भारत

Location of the templeThis Temple is dedicated to Lord Shiva, the temple is situated in Bandora village, about four...

Posted by Bipin Chauhan on Sunday, October 25, 2015

सनातन तीर्थ श्री शांतादुर्गा मंदिर, कवळे, फोंडें, गोआ, भारत

Shri Shantadurga Temple is a large temple complex 33 km (21 mi) from Panaji at the foothill of Kavalem village in Ponda...

Posted by Bipin Chauhan on Sunday, October 25, 2015

सनातन तीर्थ श्री महालक्ष्मी मंदिर, बंडोरा, गोआ, भारत


Despite the Portuguese influence that dominated #Goa over the centuries, it is fascinating to see how such a large...

Posted by Bipin Chauhan on Sunday, October 25, 2015

शिवलिंग ! अश्लीलता या आध्यात्मिकता ?


Lingam #shivlingaअश्लीलता या आध्यात्मिकता ?शिवलिङ्ग के सन्दर्भ में लोकभ्रान्ति का सारभूत उन्मूलन https://shankarsandesh.wordpress.com/2015/10/27/146/|| जय श्री राम ||

Posted by Dharamsamrat Swami Karpatri Ji on Tuesday, October 27, 2015

Adi Shankara


शॅंकरम शन्कराचार्यम केशवम बदरायनां.सूत्र-भाष्यक्ऱ्तौ वन्दे भगवंतौ पुनः पुनः

Posted by Dharamsamrat Swami Karpatri Ji on Tuesday, October 27, 2015

मंगलवार, 7 जुलाई 2015

आर्य मुदित - प्रलाप - भंजन

आर्य मुदित - प्रलाप - भंजन ---------->
__________________
१- "अवधूत श्री तैलंग स्वामी जी महाराज की एक ऐसी अद्भुत चिठ्ठी ।
जिसने कर डाली थी काशी से दयानन्द की पूरी छुट्टी ।।
भावार्थ - परम अवधूत श्री तैलंग स्वामी जी महाराज की चिठ्ठी ऐसी अद्भुत थी कि काशी में बिना अपने मन के अनुकूल निर्णय के एक पग भी काशी से न बढाने का हो -हल्ला मचाने वाले मतवाले दयानंद की काशी से छुट्टी कर डाली , पूरी छुट्टी शब्द का अभिप्राय यह है कि यद्यपि काशी के वेदज्ञ पंडितों ने दयानंद की वैचारिक छुट्टी कर दी थी तथापि व्यावहारिक धरातल पर केजरीवाल की भांति काशी में अनर्गल उत्पात मचाने वाले दयानंद की वृथा हो -हुंकारों से सभ्य समाज व्यथित हो रहा था , काशी नरेश एक सन्यासी होने के नाते दयानंद को कुछ कर नहीं सकते थे , ऐसे में काशी में दयानंद के
इस उत्पात को काशीपुरेश्वर सचल विश्वनाथ योगीराज ने स्वधाम में शान्ति बनाए रखने हेतु पूर्णतः समाप्त कर दिया !
२- दयानंद स्वयं न पचा पाया था तो बेचारे अंध - चेलों को पचेगी कहाँ ?
पिला दी अपने अवधूत बाबा ने दयानंद को ऐसी घुट्टी ।।

भावार्थ - स्वयं स्वामी दयानंद इस चिठ्ठी के ज्वर से जर्जरित होकर काशी से भाग खड़े हुए थे , ऐसे में उनके आधुनिक अन्धपरम्परा न्याय का सकुशल निर्वहन करने वाले समाजी चेलों को उसका वर्णन दग्ध करे तो आश्चर्य कैसा ? भंगोटा पिलाने में मशहूर काशीपति विश्वनाथ ने भंगेड़ी दयानंद (स्वामी दयानंद के भांग , हुक्का चिलम आदि पीने का वर्णन स्वयं उनकी जीवनी में है इसके लिए आप यू ट्यूब पर यह लिंक देखें -
https://www.youtube.com/watch?v=uWCPbDV2lUU )
को ऐसी घुट्टी पिलाई कि बेचारे दयानंद के दुरभिमान का स्वास्थ्य बिगड़ गया !

३- वाह हे योगी आपका घोटा ! जिसने उलट दिया दयानंद का लोटा ।
चिठ्ठी से आपकी दयानंद खोटा । भागा भी यूं , क्या खडाऊं क्या सोटा ।। _/\_
भावार्थ - हे योगेश्वर ! आपके ऐसे अद्भुत घोटे का क्या कहना ! जिसने मतवाले दयानंद का भी लोटा पलट दिया अर्थात् आपके लोटे का घोटा पीने के उपरांत दयानंद अपने लोटे को बिसर गया , यानी अपने आपको भूलकर बस आपका ही ध्यान उसके मनो मस्तिष्क पर चढ़ गया !!! फिर तो जहां देखे , सर्वत्र दयानंद को आप ही आप दिखाई देने लगे ! ! ऐसी मनोविदालिता में खोटे स्वभाव वाला वह दयानंद काशी से ऐसे भागा कि अपना सोटा और खडाऊं तक का भी ध्यान न रहा अर्थात् सर पर चप्पल रखकर औंधे भागने की कहावत चरितार्थ कर गया !
..बम बम भोले !! हर हर शंकर !!
........ जय योगीराज !!! हर हर महादेव !
_________________________
अथ आर्यमुदित -प्रलाप- भंजनम् ----------->
____________________
1 .श्री अजय सिन्ह द्वारा तैलंग स्वामी पर लिखित एक लेख 2010 में नागपुर की राष्ट्रधर्म मगज़ीन में छपा जिसमें यह नई हदीस उद्घाटित की गयी की जब स्वामीजी ने बनारस में शास्त्रार्थ किया उसके बाद तैलंग स्वामीजी ने उन्हंज़ एक पत्र भेजा जिसे पढकर वे वाराणसी छोड़ गये और उस पत्र में लिखा मात्र सिर्फ दयानंद जी व तैलंग जी को ही पता था।
प्रलाप - भंजन ----------->यह आपका "नई हदीस" कहना आपकी मनोव्यथामात्र है ।
2. इस लेख के लेखक अजय सिन्ह ने तैलंग स्वामी जी के लिए तो जी शब्द प्रयुक्त किया पर महान धर्मउद्धारक स्वामी दयानंद जी के लिए जी शब्द प्रयुक्त नहीं किया, न ही इस कथा का कोई संदर्भ ही बताया, इसीसे इनकी मंशा का अनुमान लगया जा सकता है।
प्रलाप - भंजन -----------> आपने लेख के लिए शुरुआत में ही " नयी हदीस " शब्द प्रयोग किया है , स्वयं आपकी मंशा स्पष्ट हो गयी है । और जो व्यक्ति भाग गया हो उसके लिए जी क्या लगाना ? जिसने भगाया उसके तेज को आदर देना सहज है । प्रायः शिष्यों की श्रवण परम्परा से ही सुनी आयी बहुत यथार्थता लोक में प्रमाणरूप से कथित हो जाती है । इस प्रकार के एक सामान्य उदाहरण के लिए देखिये धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज के अद्भुत तेज के विषय में राजीव दीक्षित का यह वक्तव्य -
https://www.youtube.com/watch?v=x4HMJ0KbOIY
स्वामी तैलंग स्वामी जी की जीवनी में (यथा - "भारत के महान् योगी" उक्त पत्रिका जिसका आप स्वयं वर्णन कर रहे हैं इत्यादि ) से जुडी ये घटनाएं यदि आपको स्वीकृत नहीं होती हैं तो ये आपकी अपनी सोच है , इस पर हम क्या करें ? आपको प्रमाण नहीं लगती तो इसमें कौन क्या कर सकता है ? इतिहास तो इति ह एवं आसीत् (ऐसा हुआ था )-ऐसा वृद्धव्यवाहार से सुनकर ही प्रायः ज्ञात होता है । आपको इसमें श्रद्धा नहीं तो हम क्या करें ? आप अपना विधवा विलाप अपने ही आर्य उपनाम धारी वेद के स्वघोषित ठेकेदारों को सुनाइये ।
3. वह तथाकथित पत्र किस वर्ष स्वामीजी को तैलंग जी द्वारा भेजा गया यह भी उल्लिखित नहीं है, जबकि स्वामीजी जीवनकाल में बनारस 7 बार गये.
प्रलाप - भंजन -----------> यह पत्र सम्वत् १९२६ (सन् १८६९) को काशी शास्त्रार्थ के तीसरे दिन भेजा गया था क्योंकि शास्त्रार्थ उसी वर्ष हुआ था , तभी स्वामी दयानंद भागे थे ऐसा कहा जाता है
4. लेखक स्वयं कहते है कि उस पत्र के बारे में केवल उन्ही दोनों को पता था तो फिर लेखक को इस बात की जानकारी कहाँ से हुई वह भी महर्षि दयानंद जी के नरवान के 127 वर्ष बाद???
प्रलाप - भंजन -----------> पत्र के बारे में का अर्थ यह भी हो सकता है कि पत्र के विषय के बारे में । जो पत्र ही कहो तो भी पत्र देने के पश्चात् हो सकता है तैलंग स्वामी ने बाद में किसी शिष्य को यह बताया हो ! इस पर जब आपको स्वयं कुछ ज्ञान नहीं तो आपका खंडन करना व्यर्थ है । आपके दयानंद अनुमान अनुमान में भारत के सभी प्रसिद्ध चमत्कारी मंदिरों पर कल्पनाएँ गढ़ गए कि वहां ये होगा , वहां ऐसा होगा , तब आप सत्यार्थ प्रकाश में प्रमाण नहीं खोजते !
5. काशी शास्त्रार्थ के सभी पंडितों की सूचि ज्ञात है पर शास्त्रार्थ के दस्तावेजों में कहीं भी तैलंग स्वामी जी का जिक्र नहीं आता। पंडित गंगाप्रसाद उपाध्याय जी ने कहा-"महर्षि 7 बार काशी गये, हर बार खुली चुनौती दी पर वहन कोई नहीं था जो उनकी चुनौती स्वीकार करता।" अंतिम बार स्वामीजी 19 नवम्बर 1879 को काशी आए और 5 मई 1880 तक रहे, अंतिम काशी यात्रा में लगभग 6 महीने उन्होने काशीस्थ ब्राह्मणों को शास्त्रार्थ के लिए ललकारा, पर सनातन धर्म की रक्षा के लिए तथाकथित प्रतिबद्ध कोई भी उनसे शास्त्रार्थ को न आया। इतिहास इसका प्रमाण है की महर्षि ने लगातार चुनौती दी पर किसी में सामर्थ्य नहीं था की स्वीकार करे, 10 जनवरी 1880 मुरादाबाद निवासी मुंशी इन्द्रमणि को स्वामीजी ने पत्र लिखा जिसमें उन्होंने कहा "अब तक कोई भी पंडित शास्त्रार्थ को तैयार न हुआ है "
प्रलाप - भंजन -----------> तैलंग स्वामी क्यों शास्त्रार्थ किये ही न थे तो भला उनका नाम क्यों होगा ? उन्होंने तो एक शास्त्रार्थ के पश्चात् स्वामी दयानंद के अनर्गल उत्पात का एक चिठ्ठी से हर हर महादेव कर दिया था जिससे वे बोरिया बिस्तर पकड़ कर चम्पत भये !
6. एक बात और ध्यान देने योग्य यह की मुंशी इन्द्रमणि के पोते भागवत सहाय बैरिस्टर ने एक बार इस्लाम अपनाना चाहां पर न तो "सनातन धर्म के रक्षक?" और न "श्री तैलंग स्वामीजी" ने ही उन्हें रोकना चाहा, हाँ आख़िरकार दयानंद के सैनिकों ने ही पुनः उन्हें वैदिक धर्म में वापस लाया। क्या यहाँ पर " सनातन धर्म रक्षकों?" ने सनातन धर्म की अवहेलना न की??
प्रलाप - भंजन -----------> इसका तैलंग स्वामी जी की चिठ्ठी विषय से कोई लेना देना नहीं , केवल प्रसंगेतर लेख बढा कर लोगों को भ्रमित करने के लिए आपने ये व्यर्थ कथा लिखी है ।
7. स्वामी दयानंद जी परिव्राजक थे, उन्होंने दक्षिण के कुछ भागों को छोडकर सम्पूर्ण भारत का प्रलापण किया था, इसके बावजूद वे काशी 7 बार गये अपने जीवनकाल में। आप महर्षि से ऐसी अपेक्षा फिर कैसे कर सकते हैं की वे हमेशा काशी में ही रहते?? फिर यह रुदाली गायन का क्या मतलब की-"काशी छोड़ भागे" ?? इस करूण क्रन्दन की जड़ें 1869 के शास्त्रार्थ में आपकी पराजय में छुपी हैं।।
प्रलाप - भंजन -----------> ये आपकी मनोव्यथा है , यह उस चिठ्ठी का ही प्रभाव था कि दयानंद ने काशी में कोई उत्पात नहीं किया । काशी से पलायन करने के उपरांत स्वयं काशी नरेश ने उनको दयावश बुलाया था क्योंकि उन्होंने कठोर शब्द "धूर्त" बोला था और दयानंद जैसे भी थे थे तो संन्यासी ही , और उनको सम्मान दिया- ऐसा आपका समाजी इतिहास बोलता है कि काशी नरेश उनको बुलाये । जो काशी नरेश उनको ऐसे दयावश बुला सकते हैं क्या वो उनके लिए शास्त्रार्थ का आयोजन नहीं करा सकते थे ? पर बेचारे दयानंद किस मुंह से हिम्मत करते ? काशी शास्त्रार्थ के बाद काशी में किसी भी प्रकार के किसी भी शास्त्रार्थ का कहीं कोई वर्णन नहीं है अपितु "दयानंद पराभूति " तथा " दुर्जनमुखमर्दन " जैसे भारतेंदु हरीशचंद्र जैसे प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकारों आदी की लेखनी के तत्कालीन प्रख्यात ग्रंथों का वर्णन मिलता है , इससे स्पष्ट है कि उस समय दयानंद का काशी में क्या चरित्र था !
8. आप लोगों को "सनातन धर्म की अवहेलना" सिर्फ मूर्तिपूजा के खंडन में नजर क्यों आती है?? क्यों आपको स्वामीजी के महान कार्य नहीं दीखते यथा- ब्रह्मचर्य का प्रचार, वेदों का प्रचार, आर्ष साहित्य का प्रचार, समाज सुधर, राष्ट्रवाद का आव्हान, राजनैतिक स्वतन्त्रता, गुरुकुल व्यवस्था का कायाकल्प, योग का प्रचार, 16 संस्कारों व यज्ञ का प्रचार, संस्कृत का प्रचार, गौरक्षा के लिए महान कार्य, दलित एवं नारी उद्धार आदि???? क्या सनातन धर्म केवल और केवल मूर्तिपूजा का विषय है? इससे आगे कुछ नहीं??
प्रलाप - भंजन -----------> इसका अवधूत तैलंग स्वामी जी की चिठ्ठी विषय से कोई सम्बन्ध नहीं । अतः ऐसे व्यर्थ के " लेख बढाओ , प्रलाप फैलाओ" के प्रसंगेतर विषयों का उत्तर देना हम आवश्यक नहीं समझते !
9. क्यों "सनातन धर्म की अवहेलना" आप महर्षि में ही देखते हो?, श्रद्धाराम फिल्लौरी जो बाइबिल के पंजाबी अनुवादक थे, पुराणों को वे भी व्यासकृत न मानते थे, और उनकी लिखी आरती "ॐ जय जगदीश हरे" आप सब मन्दिरों में गाते हैं पर तब सनातन धर्म की अवहेलना नहीं होती? श्रद्धाराम फिल्लौरी दयानंद जी को दुश्मन मानता था, यहाँ तक की उसने उन्हें झर देने का षड्यंत्र रचा, उसकी जीवनी श्रद्धा प्रकाश में अनेकों बातें दयानंद जी के खिलाफ लिखी हैं। पर उसने भी तैलंग जी के स्वामी जी को पत्र की बात को कहीं उल्लिखित नहीं किया। जबकि उसने अपने इन सनातन धर्म रक्षार्थ अहंकार पूर्ण कार्यों के प्रति चिंता व शोक प्रकट किया ।
प्रलाप - भंजन -----------> कोई भी व्यक्ति अपने पास विद्यमान जानकारियों के आधार पर ही बोलता है , अब यदि कहा जाय कि रामपाल (एक प्रसिद्ध दयानंद द्रोही )
यदि श्रद्धाराम फिल्लौरी की बात नहीं किया तो क्या श्रद्धाराम फिल्लौरी का विरोध असत्य हो गया ????? अतः यह मात्र आपका प्रलाप है ।
प्रसिद्ध दयानंद द्रोही , कबीरपंथी रामपाल के दर्शन यहाँ करें -
https://www.youtube.com/watch?v=X1vW6zRjtJs
10. श्री तैलंग स्वामीजी का नाम लेकर स्वामी दयानंद जी को बदनाम किया जा रहा है जबकि। उस समय के 'सनातन धर्म के शीर्ष रक्षक' श्रद्धाराम फिल्लोरी अपने अंतिम समय में इतने शर्मिंदा व शोकाकुल थे की स्वामीजी को लम्बा पत्र लिखकर उनके प्रति अपने सम्मान व उपासना के भाव को उजागर किया।
प्रलाप - भंजन -----------> श्रद्धाराम फिल्लोरी अगर शर्मिन्दा होता है तो इससे चिठ्ठी घटना को क्या लेना देना ? कबीरपंथी रामपाल का उदाहरण आपको ऊपर के वक्तव्य में दर्शा दिया गया है ।
11. श्री पंडित देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय जिन्होंने महर्षि का वृहद चरित्र लिखा है वे आर्यसमाज के सदस्य न थे पर स्वामीजी के चरित्र व योगदान से इतने प्रभावीत थे की अपना सम्पूर्ण जीवन स्वामीजी के जीवन इतिहास को संकलित करने व उसे आत्मकथा बनाने में ही लगा दिया । काशी से उनका सम्बन्ध भी जगजाहिर है परन्तु उनके लेखन में भी कहीं भी श्री तैलंग स्वामी जी व इस तथाकथित पत्र का जिक्र नहीं है
प्रलाप - भंजन -----------> समाजी लेखकों का क्या है ? आर्य समाज के इतिहास पर ही परस्पर इतना विवाद है कि आपके ही "राजेन्द्र जिज्ञासु " को अभी अभी एक ग्रन्थ निकालना पडा है , नाम है - इतिहास प्रदूषण, स्वयं आप समाजियों के अनुसार यह ग्रन्थ आपके ही भवानी लाल भारतीय के हदीसी कारनामों पर लिखा गया है । लेखक प्रो राजेंद्र जिज्ञासु , प्रकाशक : पण्डित लेखराम वैदिक
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10200461879347650&set=a.1957054024155.53969.1776872054&type=1&theater
12. इलाहबाद के प्रख्यात पंडित श्री शिवराम पण्डे काशी में दयानन्द जी के बहुत निकटस्थ रहे, उन्होंने काशी के पंडितों पर स्वामी दयानंद जी के प्रभाव का घन वर्णन किया है पर उन तक ने कहीं भी इस पत्र व श्री तैलंग जी स्वामी का ज़िक्र नहीं किया है।
प्रलाप - भंजन -----------> आर्य समाजी इतिहासकार भला क्यों करने लगे वर्णन ? आपके ही इन इतिहासकारों की यथार्थता भवानी लाल के उदाहरण से ऊपर सप्रमाण दर्शा दी गयी है ।
13. स्वामीजी ने स्वयं कभी ऐसे प्रभावशाली पुरुष के बारे में नहीं बताया जिनके एक पत्र के कारण उन्होंने वाराणसी छोड़ दी हो। पता नहीं राष्ट्र धर्म के लेखक को यह जानकारी कौनसे ठंडे बसते से मिली है ।
प्रलाप - भंजन -----------> स्वामी दयानंद भला क्यों उस चिठ्ठी की कथा खुलेआम बताने लगे ? आपके तर्कों की भी हद है !
14. दयानंद जी के जीवनकाल में जब पुणे से श्री जोशी जी एक सभा में पधारे तब श्री भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने काशी के पंडितों को लताड़ा था, यह काशी के समाचार पत्रों में भी छपा था। यही भारतेंदु जी शुरुआत में सनातन धर्म रक्षार्थ? दयानंद के विरुद्ध थे, पर बाद में स्वामी दयानंद जी की ओर झुक गये थे। क्या पौराणिक बन्धु उत्तर देंगे ऐसा क्यों हुआ??
प्रलाप - भंजन -----------> चोर की भी जब हद से अधिक कम्बल परेड हो जाती है तो लोग दया दिखाकर उसका पक्ष लेना शुरू करते हैं , यदि किसी कविहृदय में किसी भगवाधारी संन्यासी की चतुर्विध दुर्दशा पर कुछ सहानुभूति का बीज उत्पन्न हो गया हो तो किमाश्चर्यम् ?
15. सत्य यह है की आप जैसे सनातन धर्मी स्वामी दयानंद का विरोध करने को घोर सनातन धर्म समझते हो। यही आपका सनातन धर्म है। यहाँ तक की श्री आचार्य धर्मेन्द्र जी भी आप जैसे पंडितों की इस रीति से प्रसन्न नहीं हैं, इसलिए यहाँ तक कहते हैं की पंडित कालूराम, पंडित माधवाचार्य, पंडित गिरधर शर्मा और पंडित कृष्ण शास्त्री आदि ने कभी भी अंधविश्वासों का विरोध नहीं किया। परन्तु स्वामी दयानंद ने ऐसे रोमांचकारी कार्यों को सदैव अपना धार्मिक कर्तव्य समझा।
प्रलाप - भंजन -----------> इस वक्तव्य का भी अवधूत तैलंग स्वामी जी की चिठ्ठी विषय से कोई सम्बन्ध नहीं । अतः ऐसे व्यर्थ के "लेख बढाओ , प्रलाप फैलाओ" के प्रसंगेतर विषयों का उत्तर देना हम आवश्यक नहीं समझते !
16. पूर्व में दयानंद जी को बदनाम करने हेतु किताबें छपती रहीं हैं जिनमें 'दयानंद छल कपट दर्पण' आदि मुख्य हैं, इसका लिखने वाला था जियालाल = जिसने स्वयं स्वीकार किया था की महर्षि दयानंद धर्म रक्षक थे। ऐसी अनेकों किताबे अन्यों ने लिखीं, मुसलमानों और ईसाईयों समेत परन्तु उनमें भी कही भी इस मिथ्या आरोप का लेश भी नहीं है ।
प्रलाप - भंजन -----------> जियालाल जब स्वयं दयानंद को छलिया और कपटी बता रहे हैं तो स्पष्ट है कि दयानंद के जीवन में छल कपट तो अवश्य था , अच्छाई के अंश किसमें नहीं होते ? दयानंद की अच्छाई के कुछेक न्यूनांश यदि जियालाल ने स्वीकृत किये तो इससे दयानंद के कपट और छल के महा भयंकर गहरे दाग नहीं छिप गए !!!
मुदित आर्य - अतः मेरा दोनों ही पक्षों से निवेदन है की इस हिन्दू कुल कलह को आज इस पोस्ट के साथ समाप्त कर के धर्म पथ पर उत्कर्ष के कदम उठाए जाएँ।
प्रलाप - भंजन -----------> वाह रे ! पूरी पोस्ट पर स्वघोषित आर्य उपनाम के अनुरूप दयानंद का अनर्गल व्यर्थ महिमागान , और अंत में दोनों पक्षों को नसीहत के नाम पर अपना भोला भगत बन गए !!! पलायनवादी दयानंद और वैदिक -धर्मद्रोही एवं कपटी आर्य - समाज के प्रचार का कोई और शातिराना तरीका ढूंढिए !!
धर्म की जय हो !
अधर्म का नाश हो !
प्राणियों में सद्भावना हो !
विश्व का कल्याण हो !
गोहत्या बंद हो !
गोमाता की जय हो !
हर हर महादेव !
।। जय श्री राम ।।

मनु-स्मृति

मनु-स्मृति
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धर्म की जय हो !
अधर्म का नाश हो !
प्राणियों में सद्भावना हो !
विश्व का कल्याण हो !
गोहत्या बंद हो !
गोमाता की जय हो !
हर हर महादेव !
।। जय श्री राम ।।

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