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गुरुवार, 30 मार्च 2017

"जीवन जाह्नवी"

Karpatri Dharamsamrat varanasi kedar ghat ganga ganges
प्रातः स्मरणीय ।
परम पूज्य ।
धर्मसम्राट ।
॥ स्वामी करपात्री जी महाराज की जय हो ॥
हर हर महादेव ।
॥ जय जगदंबिके ॥
ब्रह्मलीन धर्मसम्राट् स्वामी श्रीकरपात्रीजी महाराज

‘करपात्र स्वामी’, अर्थात् ‘कर’ ही है पात्र जिनका – ऐसे स्वामी हरिहरानंद सरस्वती संसार में ‘करपात्री जी’ के नाम से प्रसिद्ध हुए । वे एक युगपुरुष थे । इतिहास साक्षी है कि भारत की इस पवित्र भूमि ने समय-समय पर ऐसे संत-महात्माओं और आचार्यों को अवतरित किया, जिनके जीवनसे भारतीय संस्कृति तथा सनातन धर्म को प्रकाश तथा संजीवनी मिली । इसी कडी में, आदिशंकराचार्य की परंपरा में अनंत श्रीस्वामी करपात्री जी महाराज अवतरित हुए । उनमें अलौकिक प्रतिभा, तपस्या एवं साधनाका असीम तेज था । कलि के इस प्रथम चरण में जीवनपर्यंत वर्णाश्रम व्यवस्था और धर्म की रक्षा के लिए वे संघर्षरत तो रहे ही, जगत को वेद-शास्त्र और धर्म के सूक्ष्म तत्वों से अवगत भी कराया ।
सारणी
१. पारिवारिक जीवन २. ज्ञानसंपादन ३. महामना मालवीयजीसे शास्त्रार्थ ४. साधना ५. गुरुप्रप्ती ६. धर्मप्रसार ७. सुमेरुपीठकी स्थापना ८. दिनचर्या ९. सनातनधर्म-विजय-महोत्सव १०. आक्षेपोंके (शंकाओं, आपत्तियोंके) समाधानार्थ ग्रन्थ रचना ११. मेरा नहीं रामका चित्र चाहिए १२.भगवदबुद्धि भगवानकी पूजाका अमोघ साधन  
पारिवारिक जीवन
एक बार महाराज श्री ने स्वयं बताया था कि बाल्यावस्था में जब वे किसी संत-महात्मा या साधुको देखते थे, तो उनके मनमें उनके प्रति स्वाभाविक आकर्षण उत्पन्न हो जाता था । उस समय उनकी यही इच्छा होती कि मैं भी उनके साथ हो जाऊं । कई बार तो वे साधुओंके साथ जाने भी लगते; परंतु परिवारके लोग उन्हें पकडकर लौटा ले आते । उनके पिताजीने जब अनुभव किया कि इनका मन घर-गृहस्थी में नहीं लग रहा है, तो उन्होंने किशोरावस्था में ही इनका विवाह कर दिया । उन्हें आशा थी कि विवाह के उपरांत सामान्य रूप से घर-गृहस्थीके कार्यों में ये आसक्त हो जाएंगे । परंतु विधि की विडंबना कुछ और ही थी । विवाहके पश्चात् तथा पत्नी के आ जानेपर भी वे घर-गृहस्थीके प्रति पूर्ववत् ही उदासीन एवं अनासक्त रहते । साधु-संतोमें ही उनका मन रमा रहता था । संसारसे विरक्त रहते थे । पिता ने जान लिया कि अब यह अधिक दिनोंतक घर में टिकनेवाला नहीं है । पिताकी इच्छा थी कि एक संतान हो जाती तो वंश चलने लगता । पिताकी इच्छा पूरी हुई । एक कन्याका जन्म हुआ । तदुपरांत कुछ ही दिनों पश्चात्, घरसे निकल पडे । पारिवारिक जनों ने इन्हें पुनः घर लौटानेका बहुत प्रयत्न किया; परंतु वे संसारकी नश्वरता से परिचित हो चुके थे । उत्कट वैराग्य जागृत हो चुका था । अतः परमार्थ-पथसे लौटकर पुनः घर आना उन्हें स्वीकार नहीं हुआ ।
ज्ञानसंपादन
अलवर में नर्मदा के तटपर स्वामी श्री विश्वेश्वरानंदजी महाराजश्रीके विद्यागुरु थे । वहां महाराज ने लगभग २ वर्ष के अल्पकालमें ही व्याकरण, न्याय, सांख्य और वेदान्तकी शिक्षा प्राप्त की । साथ ही, प्रस्थानत्रयी आदि विषयोंमें वे निपुण हो गए । महाराजश्रीकी प्रतिभा इतनी प्रखर थी कि जिस विषयको वे एक बार देख लेते, वह उन्हें आत्मसात हो जाता था । ऋषिकेशमें कोयलघाटी नामक स्थान है, जहां एक पुरातन वट-वृक्ष आज भी स्थित है । उस वृक्षके कोटरमें एक व्यक्तिके रहने योग्य स्थान है, जिसमें महाराजश्री विश्राम किया करते थे । उन दिनों लंगोटी के अतिरिक्त महाराजश्रीके पास कोई वस्त्र नहीं होता था । तीन दिन अथवा सात दिन उपरांत दूधकी भिक्षा, कर (हाथ) से ही ग्रहण करते थे । इसीलिए वे आगे चलकर ‘करपात्रीस्वामी’, इस नामसे प्रसिद्ध हुए । उस समय स्वामी जी यात्राके लिए किसी प्रकारके यान अथवा वाहनका उपयोग नहीं करते थे; पैदल ही यात्रा करते थे ।
महामना मालवीय जी से शास्त्रार्थ
जिन दिनों महाराजश्री ऋषिकेशमें रहते थे, उन दिनों वे प्रकाशमें तब आए, जब महामना मदनमोहन मालवीयजीसे उनका शास्त्रार्थ हुआ । यद्यपि श्री मालवीयजी सनातन धर्मी नेता थे; परंतु समय और परिस्थितिके अनुसार स्त्री और शूद्रको भी प्रणवकी दीक्षा देने का समर्थन करते थे और इसे शास्त्र-सम्मत बताते थे । उन्होंने इस विषयपर शास्त्रार्थ की भी घोषणा कर दी । कुछ लोग, जो महाराजश्री से परिचित थे, उनसे मिले और प्रार्थना करने लगे कि आप जैसे विद्वान के रहते, इस प्रकारके आह्वानका सामना होना ही चाहिए । इस विषयमें शास्त्र-सम्मत निर्णय होना ही चाहिए । शास्त्र विपरीत कोई भी बात महाराज श्री को सहन नहीं होती थी । उस समय महाराजने कोई उत्तर नहीं दिया । शास्त्रार्थके लिए एक विशेष मंचका निर्माण किया गया, जहां ध्वनिवर्धक एवं ध्वनिक्षेपक आदि उपकरण लगे थे । उस क्षेत्रके प्रतिष्ठित लोग शास्त्रार्थमें आमंत्रित थे । मालवीयजी अपनी बातके पक्षमें तर्क-युक्ति और शास्त्रीय प्रमाण अपने भाषणमें मंचपर प्रस्तुत कर रहे थे । मंचसे थोडी ही दूर एक वृक्षके नीचे लंगोटी बांधे एक युवासाधु खडा होकर मालवीयजीके तर्क-युक्ति और प्रमाणोंका उत्तर देने लगा ।
धीरे-धीरे कुछ श्रोता वहां जुटने लगे । थोडे ही समयमें यह बात विद्युलता की भांति आस-पास के क्षेत्रों में प्रसारित हो गयी कि एक प्रतिभावान निष्कांचन साधु एक वृक्षके नीचे खडा होकर मालवीयजी की बातों का उत्तर दे रहा है । अब तो संत-महात्मा और विशिष्ट जन भी वहां पहुंचने लगे । मंचपर आसीन लोग भी उस महात्माका उत्तर सुननेको आतुर हो गए । यह बात मालवीयजी के कानोंतक जा पहुंची और लोगों ने उनसे आग्रह किया कि उस साधुको इस मंचपर लाया जाए । कुछ लोगोंने महाराजश्रीको पहचाना । मालवीयजी स्वयं वृक्षके नीचे पधारे और महाराजश्रीसे मंच पर आने का आग्रह किया । महाराजने तत्काल शास्त्रार्थका आह्वान स्वीकार कर लिया, एवं मंचपर मालवीयजी से शास्त्रार्थ होना निश्चित हो गया । सेठजी श्री. जयदयालजी गोयंद का तथा सेठ श्री. गौरीशंकरजी गोयन्दका मध्यस्थ बनाए गए । तीन दिनों तक शास्त्रार्थ चला । मध्यस्थों ने यह निर्णय दिया कि महाराजश्रीका पक्ष ही शास्त्र-सम्मत है । मालवीयजी अपनी बात देश-काल-परिस्थिति के अनुसार कहते हैं । उस समय सर्वप्रथम ही सर्वसाधारण समाजको महाराज श्री का परिचय हुआ और वे जनता-जनार्दनके प्रकाश में आए ।
साधना
उस घटनाके पश्चात्, कुछ दिन महाराजने वृंदावनमें निवास किया । वहां उन्होंने निराहार रहकर स्वान्तः सुखाय श्रीमद्भागवत-सप्ताहका पाठ किया । उन दिनों वे सप्ताहमें एक बार कर (हाथ)- द्वारा दूधकी भिक्षा मांगते । दूसरे सप्ताह पुनः पाठ आरंभ कर देते । इस प्रकार अनेक दिनों तक यह कार्यक्रम चलता रहा ।
एक बार किसी प्रसंगवश महाराजने मुझे बताया कि वे भीषण जाडे के समय पौष मास की अर्धरात्रि में निर्वस्त्र ही केवल एक लंगोटी धारणकर साधना करने बैठ जाते थे और संपूर्ण रात्रि साधनामें लगे रहते थे । इसके अतिरिक्त विविध प्रकारकी यौगिक क्रियाएं भी महाराजने संपन्न की । खेचरी आदि यौगिक क्रियाएं, जिनमें जिह्वा काटनेकी क्रिया एवं इन्द्रिय द्वारा पारा खींचने की भी क्रिया होती है, ये सब महाराज ने की । मैंने एक बार महाराज जी से पूछा – ‘‘महाराज, ये सब आपने क्यों किया ?’’ महाराज ने उत्तर दिया – ‘‘कुतूहलवश हमने यह सब करके देखा कि इन सबमें कौन-सा तत्व है ।’’ इस प्रकार महाराजश्रीने प्रायः संपूर्ण यौगिक क्रियाएं तथा हठयोग की साधना पूरी की ।
गुरुप्राप्ति
महाराज ने प्रारंभमें विद्वत संन्यास लिया था । पश्चात् विद्वानोंकी सभामें इस विषयमें विचार-विमर्श किया गया और निर्णय हुआ कि शास्त्रानुसार संन्यास ग्रहण करनेके लिए दण्ड आदि धारणकर लिङ्ग-संन्यास लेना चाहिए । महाराजने तत्कालीन ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगदगुरू शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी से दण्ड ग्रहण किया । ज्योतिष्पीठाधीश्वर स्वामी ब्रह्मानन्दजी भी करपात्रस्वामी जैसे योग्य शिष्य को पाकर कृत कृत्य हो गए । उन्होंने निर्णय लिया कि मेरे बाद उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठ-शंकराचार्य के पदपर स्वामी करपात्रजीको ही अभिषिक्त किया जाएगा ।
धर्मप्रसार
महान संत विश्ववंद्य, धर्मसम्राट, श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य, परमवीतराग, यतिचक्रचूडामणि अनंत श्रीविभूषित, दण्डी संन्यासी, श्रीहरिहरानन्द सरस्वती स्वामी श्री करपात्री जी महाराज हैं । प्रश्न चाहे वर्णाश्रम मर्यादा संरक्षणका हो अथवा शाश्वत सनातन धर्मके सत्य सिद्धान्तोंके संस्थापनका हो, वैदिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार में उन्होंने अपना सर्वस्व लगा दिया । पराधीन भारतमें जन-जनमें राजनीतिक चेतना जागृत करनेका कार्य तो अनेक कर्मनिष्ठ नेताओं ने किया, किंतु विपरीत गति, कलुषित वातावरण एवं अल्पसहयोगमें भी धर्म, संस्कृति, वेद, शास्त्र, मंदिर, गौ, ब्राह्मण, यज्ञ एवं आस्तिकवादके रक्षणार्थ जन- साधारणमें व्यापक प्रचार करनेके गुरुतर कार्यका संपादन यदि किसीने किया है, तो वे हैं एक मात्र शिवावतार श्री स्वामी करपात्रीजी महाराज । अतः जिसे अनादि अपौरुषेय वेदोंका दर्शन करना हो, जिसे वेदादि सत्शास्त्रों एवं पुराण, स्मृति, आदिका मूर्त रूप देखना हो, उसे एक ही व्यक्तिमें यह सर्व दर्शन हो सकता है और वे हैं श्री स्वामी करपात्रीजी महाराज । महाराजश्री की अध्यापनकला भी अनोखी थी । जब वे शास्त्रीय विषय का प्रतिपादन करते थे, तो शिष्यगणों के चित्तमें वह सर्वदाके लिए अंकित हो जाता था, जो भुलाए भी नहीं भूलता था ।
उनकी चतुः सूत्री –
१. धर्म की जय हो ।
२. अधर्म का नाश हो ।
३. प्राणियों में सद्भावना हो ।
४. विश्व का कल्याण हो ।
सुमेरुपीठकी स्थापना
धर्मप्रचारार्थ देश के चारों कोनों में चार पीठोंकी स्थापना आदिशंकराचार्यने की थी । परंतु, शास्त्रोंमें इसके अतिरिक्त सुमेरुपीठका वर्णन भी मिलनेके कारण महाराजश्रीने काशीमें पांचवें पीठ ‘सुमेरुपीठ’की स्थापना की, जिसके शंकराचार्य-पदपर सर्वप्रथम अनंतश्री स्वामी महेश्वरानंद सरस्वतीजी महाराज का प्रयागराजमें अभिषेक किया गया ।
दिनचर्या
स्वामी श्रीकरपात्रीजीकी दिनचर्या भी विलक्षण थी, जिसे उनके भक्तगण भी नहीं जान पाए ।
कई-कई दिवस तक निर्जल व्रत, ढाई घण्टे का शीर्षासन, रात्रि डेढ़ बजे ही उठकर प्रतिदिन दस मील पैदल भ्रमण, घंटों एक आसन से बैठकर अध्ययन एवं लेखन, पूजन के त्रिकाल नियमों का अक्षरशः पालन, २४ घण्टों में एक बार सामान्य भिक्षा पत्तल या हाथ पर रखकर ही ग्रहण करना, साठ वर्षों से नमक-मिष्टान्न का परित्याग, अनवरत धर्मयात्रायें, भाषण, आंदोलन, विभिन्न विषयों पर शास्त्रीय पक्ष एवं विचार उपस्थापन ।
यह बात प्रसिद्ध थी कि महाराज को भिक्षा ग्रहण करने में समय नहीं लगता था, ३ अथवा ५ पलमें ही उनकी भिक्षा समाप्त हो जाती थी । जो समय लगता था, वह केवल भगवानका भोग लगाने में ही लगता था ।
अहर्निश धर्म-शास्त्र, वेद गो संरक्षण में सक्रिय इस ऋषि को पाकर सचमुच आज भारत माता धन्य हुई है ।
समाज सेवा में रत 'सर्वजन सुखाय' , 'सर्वजन हिताय', चतुः सूत्री का भारतीय वैदिक सनातन भावना को अजस्त्र अबाध अविरल गति से इस भीषण कलिकाल में अकेले ही आगे बढ़ाने के कार्य चौबीसों घण्टे व्यस्त इस सन्यासी को शत-शत प्रणाम, जो व्यक्ति आकृति में देव तुल्य पवित्र ।
धन्य हैं वो लोग जिन्होने इनके दर्शन किये हैं, अभागे हैं वो लोग जो आज भी उनसे अपरिचित हैं ।
श्रीहरि --  उनका यह कार्यक्रम नित्य नियमित रूपसे चलता रहता । यहाँ तक कि यात्रा में भी वे इस कार्यक्रम का निर्वाह पूरी तत्परतासे करते । महाराजकी यात्रा लोहपथगामिनी से नहीं होती थी । वे मोटरकार से ही यात्रा करते थे । रात्रिमें गाडी तब तक चलती, जबतक उनका शयन चलता रहता । रात्रिमें १ बजे गाडी रोक दी जाती और वे अपने दैनिक कृत्यों में व्यस्त हो जाते । महाराज की पूजा-अर्चा प्रतिदिन ३ बार होती थी । प्रातः कालीन पूजा प्रायः एकाकी करते थे । मध्याह्नकालीन पूजा दिनमें लगभग १२ बजे तथा सायंकालीन पूजा रात्रिमें ७.३० से ९.३० बजेतक चलती । दोपहर और रात्रिका पूजन सर्वसाधारण भक्तजनोंके मध्य होता । प्रातः ८ से १२ तक तथा सायं ६ से ७.३० के मध्य सर्वसाधारणसे मिलने-जुलने तथा पठन-पाठन, स्वाध्याय और लेखन आदि कार्य होता ।
परिपक्व वैराग्य
ग्रीष्म, वर्षा, शिशिर सभी ऋतुओंमें वे प्रायः एक ही चादर ओढकर सोते थे ।
निर्जला एकादशी-व्रत
महाराजजी नियमके अटल थे । प्रत्येक एकादशी को उनका निर्जल व्रत रहता था । मार्ग में या कहीं भी भीषण-से-भीषण ग्रीष्मकाल अथवा आपत्कालमें भी वे एकादशीको जल ग्रहण नहीं करते थे ।
सनातनधर्म-विजय-महोत्सव
स्वामी दयानन्द सरस्वतीके निर्वाणको १०० वर्ष पूरे होनेपर आर्यसमाजने उनका शताब्दी समारोह मनाया और यह घोषणा की कि स्वामी दयानन्दके अनुयायी आर्यसमाजी विद्वान् शास्त्रार्थ में, दिग्दिगन्त में विजय-यात्रा करते हुए पधार रहे हैं । यहां ये अवतारवाद, मूर्तिपूजा और श्राद्धादि रूढियोंका खण्डन करेंगे । जो चाहे उनसे शास्त्रशास्त्रार्थ कर सकता है । महाराजश्री इस आह्वानको कब सहन कर सकते थे । उन्होंने तुरंत इस आह्वान को स्वीकार करते हुए कहा, ‘धार्मिक क्षेत्रमें भी पंचशील का सिद्धांत माना जाना चाहिए । अपनी-अपनी आस्था-मान्यता और विश्वासके अनुसार सबको अपने धार्मिक कृत्य सम्पन्न करने का अधिकार है ।
परंतु किसीके धर्ममें हस्तक्षेप और आक्रमण कभी सहन नहीं किया जा सकता । अतः उसका प्रतिकार किया जाएगा ।’ इस सिद्धांतकी रक्षाके लिए उन्होंने शास्त्रस्त्रार्थ भी करना स्वीकार किया ।
महाराजजीका यह स्वभाव था कि वे शास्त्रशास्त्रीय के विरुद्ध कुछ भी सुनना नहीं चाहते थे । कोई कितना भी निकटतम व्यक्ति क्यों न हो, यदि वह शास्त्रशास्त्रीय सिद्धातों के विरुद्ध कुछ कहता है अथवा लिखता है, तो महाराज तत्काल उसका खण्डन करते और उस बातका युक्ति और तर्कसहित शास्त्रशास्त्रके पक्ष में उत्तर देते थे ।
आक्षेपोंके (शंकाओं, आपत्तियों के) समाधानार्थ ग्रन्थ रचना
कुछ व्यासगणों ने एक बार महाराजश्री को कामिल बुल्के की लिखी ‘रामकथा’ लाकर दी तथा कामिल बुल्के द्वारा विभिन्न रामायणों का संदर्भ देकर भगवान् राम और भगवती सीता पर जो आक्षेप किए गए थे, उस ओर ध्यान आकृष्ट किया । तब महाराजजीने तत्काल उन सभी आक्षेपोंका उत्तर लिखा तथा जिन रामायण ग्रंथोंका संदर्भ बुल्के ने दिया था, उन सभी ग्रंथोंको देखकर रामायणसे संबाधित जो भी शंकाएं थीं, उन सबका निराकरण एवं समाधान ‘रामायण-मिमांसा’ नामक ग्रंथ लिखकर किया । इसी प्रकार आचार्य रजनीशकी ‘संभोगसे समाधिकी ओर’ तथा ‘समाजवाद और पूंजीवाद’ पुस्तक किसी ने महाराजको लाकर दी । महाराजजीने उन्हें पढा और तत्काल उसका उत्तर लिखे बिना नहीं रह सके । शास्त्रशास्त्रीय सिद्धांतों के विपरीत देशभक्ति, राष्ट्रवाद, और राजनीति से सम्बन्धित विचारधाराओं का खण्डन किए बिना महाराज रह नहीं सकते थे । इस सम्बधमें स्वातंत्रवीर सावरकर तथा गुरु गोलवलकरजी के विचारोंका खंडन महाराजश्री ने ‘विचारपीयूष’ नामक ग्रंथ लिखकर किया ।
मेरा नहीं, #राम का चित्र चाहिए
महाराज द्वारा रचित ‘रामायण-मिमांसा’ पुस्तक के प्रकाशनका दायित्व एक शिष्यपर था । पुस्तक लगभग छप चुकी थी । परंतु आवरण आदि बांधना शेष था । महाराजने एक दिन उससे पूछा कि इस पुस्तक के प्रकाशन में विलंब क्यों हो रहा है ? उसने उत्तर दिया, ‘महाराज, कुछ लोगोंकी भावना है कि इस ग्रंथमें आपका भी एक चित्र होना चाहिए । चित्र बनने में कुछ विलम्ब होने के कारण पुस्तक प्रकाशनमें विलंब हो रहा है ।’ यह सुनकर महाराज कुछ विचलितसे हुए और तत्काल कहा, ‘‘सावधान! इस विषयमें मैं जैसा कहूं, वैसा ही करना, दूसरोंका कहा नहीं करना । यदि चित्र देना ही है, तो भगवान् राम का पञ्चायतन चित्र देना, मेरा नहीं ।’’
विदेश-यात्राके संबन्धमें महाराज यह कहते कि आज तो पण्डित और सनातनधर्मी प्रायः सभी विदेश यात्रा करते हैं । मैं किसे मना करूं । अपनी मानसिक-दुर्बलता के कारण शास्त्र के विपरीत कोई व्यक्ति आचरण कर सकता है । परंतु वह यदि अपने इस कृत्यको शास्त्रसम्मत सिद्ध करने की चेष्टा करता है, तो यह घोर अन्याय है । सत्पुरुषों को प्रामाणिकता से अपनी मानसिक-दुर्बलता को स्वीकारते हुए शास्त्र का यथार्थ प्रतिपादन इस प्रकार से करना चाहिए, जिससे आनेवाली पीढियों को शास्त्र के वास्तविक अर्थ को समझने में भ्रम न रह जाए । महाराजश्री ने तत्काल विदेश-यात्रा पर कई लेख लिखे, जिसमें शास्त्रीय दृष्टि से विदेश-यात्रा के निषेध का प्रतिपादन किया गया ।
मंदिर-मर्यादा का संरक्षण तथा श्रीकाशी-विश्वनाथकी स्थापना
मंदिर-प्रवेशके संबन्धमें भी महाराजका मत स्पष्ट था । वे हरिजनोंके हृदय से हितचिन्तक थे । एक बार कानपुरमें ‘अखिल भारतवर्षीय धर्मसंघ’का महाधिवेशन चल रहा था । उत्तर प्रदेशके बाबू सम्पूर्णानंदजी वहां पधारे । महाराजश्री भी वहां उपस्थित थे । सम्पूर्णानंदजीने अपने भाषण में हरिजन-प्रवेश की चर्चा की । उनके भाषणके उपरांत महाराजने बडे युक्तिपूर्वक ढंग से उनके सभी प्रश्नों का उत्तर दिया और कहा कि हमारे शास्त्र सम्पूर्ण जीवों के कल्याणका ऐसा उपाय बताते हैं तथा अधिकारानुसार कर्तव्य का निर्देश करते हैं, जिससे वास्तविक कल्याण हो ।
साधु को स्वावलम्बी होना चाहिए
साधु के लिए कलंक किसी संदर्भमें महाराज जी ने कहा कि कभी-कभी साधु के पुस्तकों में, तकियों में तथा बिछावन आदिमें रुपए-पैसे मिलते हैं । यह साधुके लिए कलंक है ।
भगवद्बुद्धि भगवान् की पूजा का अमोघ साधन
बातचीत के क्रममें एक बार महाराज ने बताया कि हमारे धर्मशास्त्रों में मनुष्य के कल्याण के लिए भगवत्सेवा, आराधना जैसी पूजा की बडी सरल विधियों का प्रतिपादन किया गया है । घ रमें पति-पत्नी, माता-पिता, पुत्र-पौत्र, और बन्धु-बान्धवों में मनुष्य का स्वाभाविक स्नेह-प्रेम होता ही है तथा मोह-ममता के वशीभूत होकर उनकी सेवा-अर्चा भी करनी पडती है । यदि हम उन पारिवारिक सदस्यों में मोह-ममता के स्थानपर भगवद्बुद्धि कर लें, वृद्ध माता-पिता को माता अन्नपूर्णा एवं भगवान् विश्वनाथ का स्वरूप मान लें, पति को परमेश्वर, पुत्र को मदनमोहन, श्यामसुंदर, लाडले पौत्र को लड्डुगोपाल, पुत्रवधू को राधारानी, कुमारी कन्या के प्रति भगवती जगदम्बा, इस प्रकारकी भावना बना लें, तो पारिवारिक जनों के निमित्त किए गए सभी कार्य अपनेआप ही भगवान की पूजा में परिवर्तित हो सकते हैं ।
महाराजश्री ने कहा कि ‘जब पत्थर की मूर्तियों में भगवान्की पूजा हो सकती है, तो सचल-सजीव स्नेही जनों में भगवद्भाव हो जाए, तो भगवान की पूजा क्यों नहीं हो सकती ।’
#वाचस्पति: ०९ जनवरी सन् १९७९ को सांयकाल चार बजे श्री संपूर्णा नन्द संस्कृत विश्वविद्यालय की ओर से उच्चतम उपाधि 'वाचस्पति' से सम्मानित किये गये ।
भारतीय संस्कृति और सनातनधर्म को समझने के लिए कोई एक ऐसा ग्रन्थ होना चाहिए, जिसे पढकर सनातनधर्म की सम्पूर्ण बातों की जानकारी हो जाए । यह सुनकर महाराजश्री ने तत्काल उत्तर दिया कि यदि भारतीय संस्कृति और सनातनधर्म की पूर्ण जानकारी के लिए कोई एक ही ग्रन्थ पढना चाहे, तो वह गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी की रामचरितमानस पढे ।
माघ शुक्ला द्वादशी तदनुसार ०५ फ़रवरी १९८२ को जब काशी से पुरी पीठ के वर्तमान शंकराचार्य काशी से उरई प्रस्थान करने लगे तो 'अभिनव शंकर' बोले 'हाँ, हाँ अवश्य जाओ पर देखो सोमवार (८ फ़रवरी) को काशी अवश्य लौट आना - माघ शुक्ला चतुर्दशी संवत २०३८ (०७ फ़रवरी १९८२) को जब ब्रह्मचारी पूजा के पुष्प लेकर समुप स्थित हुआ तो स्वयं केदार घाट वाराणसी में गंगास्नान कर सोपानरोहण पूर्वक निजतपोभूमि वेदानुसंधान संस्थान कक्ष में आकर ब्रह्मचारी को निर्देश दिया की पूजा लगा आ-अनंतर नित्य आराधना समाप्त कर कुछ देर विश्राम किया ।
फिर 'शिव', 'शिव', 'शिव', ले नाम का उच्चारण आरंभ कर दिया ।
श्री सूक्त का पाठ कर नेत्रोन्मिलन कर त्राटक लगा दिया .... श्वास-प्रश्वास की गति का तार तम्य उध्-र्वगामी करते हुए पंचप्राणों को महाप्राण में प्रविलिनीकरण को क्रियात्मक रूप देना प्रारंभ कर दिया तो उपस्थित ब्रह्मचारी ने पुकारा तो एक दूसरे ब्रह्मचारी ने आकर उन त्रिपुंड धारी देव तुल्य पवित्रात्मा के मुखारबिन्दु में तुलसी गंगाजल डाल दिया - उसका पान कर लिया (उक्त क्रिया से शिर-भारी-पीड़ा होने की बात कही) परन्तु मुख से निरंतर 'शिव', 'शिव' निकल रहा था ।
ब्रह्मालिन हो गयी ।
पूर्णिमा को मानो ग्रहण लग गया था ।   
 यह प्रतीत होता था कि महाराजश्रीके जीवनका सम्पूर्ण कार्य योजनाबद्ध था । गृहस्थीके उपरांत तपोमय साधनामय जीवन, धर्मसंघकी स्थापना, यज्ञ-युगका प्रारम्भ, सर्ववेद-शाखा-सम्मेलन, धार्मिक महाधिवेशन, रामराज्य-परिषदके द्वारा राजनीतिमें प्रवेश, हिंदु कोड बिलका प्रबल विरोध तथा गो-हत्या-बंदी आंदोलनका संचालन आदि संपूर्ण कार्य महाराजश्रीके द्वारा सार्वजनिक जीवनमें सम्पन्न हुए । देशमें धार्मिक जगत्की महान् विभूतियों को एक मंच पर लाने का श्रेय महाराजश्री को ही है ।
उन दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघ-संचालक श्री. माधवराव सदाशिव गोलवलकरजी भी स्वामीजी से मिले । उनकी यह भावना थी कि हिंदु संगठन को सुदृढ करने की दृष्टि से हिंदु जगत्के सभी नेता एक मंचपर आएं तथा स्वामीजी महाराजका आशीर्वाद जनसंघको प्राप्त होता रहे । परंतु, वर्णाश्रम-व्यवस्था और मर्यादाके विपरीत राजनीति महाराजश्रीको स्वीकार नहीं थी । वे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम के रामराज्य के अनुसार शास्त्रीय विधि से भारतमें राज्य शासन-संचालन के पक्षधर थे और इसी में वे जगत्का कल्याण मानते थे । अतः इस संदर्भ में कोई समझौता होना सम्भव नहीं था ।
जीवनके उत्तरार्ध में महाराजश्री ने धर्म के बहिर्मुखी कार्यों से स्वयं को समेटना प्रारम्भ कर दिया । अब महाराजश्री की रुचि लेखन-कार्य की ओर अधिक हो गयी । महाराजश्रीने वेदपर भाष्य लिखना प्रारम्भ किया । सर्वप्रथम ‘वेद-भाष्य-भूमिका’ नामक एक बृहद ग्रन्थकी रचना महाराजके द्वारा हुई । जिसमें लगभग एक सहस्रपृठ हैं । इस ग्रन्थ में महाराजने वेदों से सम्बन्धित अब तक के सभी आरोपों का एवं आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद के संपूर्ण आक्षेपों का निराकरण करते हुए प्राचीन ऋषि-महर्षि-प्रणीत परम्परागत सिद्धान्तों का एक बडे समारोह में प्रतिपादन किया । इस ग्रंथ का विमोचन काशी संस्कृत विद्यापीठ में वहां के कुलपति काशिराज डॉ. विभूतिनारायण सिंहके करकमलों से सम्पन्न हुआ । श्री. राधाकृष्ण धानुका प्रकाशन-संस्थानकी ओरसे इस ग्रंथका प्रकाशन हुआ । तदनन्तर महाराजश्री ने सम्पूर्ण शुक्ल यजुर्वेद पर भाष्य-टीका का प्रणयन किया । ऋग्वेद पर भाष्य लिखा ।
अन्नं न निन्द्यात् । तद्व्रतम् । प्राणो वा अन्नम् । शरीरमन्नादम् । प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम् । शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान् भवति । प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ॥
॥ धर्म की जय हो ॥
॥ अधर्म का नाश हो ॥
॥ प्राणियों में सद्भावना हो ॥
॥ विश्व का कल्याण हो ॥
सत्यमेव परं ब्रह्म सत्यमेव परं तपः ।।
सत्यमेव परो यज्ञस्सत्यमेव परं श्रुतम् ।।
सत्यं सुप्तेषु जागर्ति सत्यं च परमं पदम् ।।
सत्येनैव धृता पृथ्वी सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम् ।।
ततो यज्ञश्च पुण्यं च देवर्षिपितृपूजने ।।
आपो विद्या च ते सर्वे सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ।।
सत्यं यज्ञस्तपो दानं मंत्रा देवी सरस्वती।।
ब्रह्मचर्य्यं तथा सत्यमोंकारस्सत्यमेव च ।।
सत्येन वायुरभ्येति सत्येन तपते रविः ।।
सत्येनाग्निर्निर्दहति स्वर्गस्सत्येन तिष्ठति ।।
पालनं सर्ववेदानां सर्वतीर्थावगाहनम् ।।
सत्येन वहते लोके सर्वमाप्नोत्यसंशयम्।।
अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् ।।
लक्षाणि क्रतवश्चैव सत्यमेव विशिष्यते ।।
सत्येन देवाः पितरो मानवोरगराक्षसाः ।।
प्रीयंते सत्यतस्सर्वे लोकाश्च सचराचराः ।।
सत्यमाहुः परं धर्मं सत्यमाहुः परं पदम् ।।
सत्यमाहुः परं ब्रह्म तस्मात्सत्यं सदा वदेत् ।।
मुनयस्सत्यनिरतास्तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम् ।।
सत्यधर्मरतास्सिद्धास्ततस्स्वर्गं च ते गताः ।।
अप्सरोगणसंविष्टैर्विमानैःपरिमातृभिः ।।
वक्तव्यं च सदा सत्यं न सत्याद्विद्यते परम् ।।
अगाधे विपुले सिद्धे सत्यतीर्थे शुचिह्रदे ।।
स्नातव्यं मनसा युक्तं स्थानं तत्परमं स्मृतम् ।।
आत्मार्थे वा परार्थे वा पुत्रार्थे वापि मानवाः ।।
अनृतं ये न भाषंते ते नरास्स्वर्गगामिनः ।।
वेदा यज्ञास्तथा मंत्रास्संति विप्रेषु नित्यशः ।।
नोभांत्यपि ह्यसत्येषु तस्मात्सत्यं समाचरेत् ।।

शनिवार, 11 मार्च 2017

Counting of Vote begins in Uttar Pradesh, Punjab, Uttrakhand Goa and Manipur, Live News Coverage from DD NEWS


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GENERAL ELECTION TO VIDHAN SABHA TRENDS & RESULT 2017

धर्म की जय हो।
अधर्म का नाश हो।
प्राणियों में सद्भावना हो।
विश्व का कल्याण हो।
गोमाता की जय हो।
हर हर महादेव।

॥ जय राम ॥

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धर्म की जय हो।
अधर्म का नाश हो।
प्राणियों में सद्भावना हो।
विश्व का कल्याण हो।
गोमाता की जय हो।
हर हर महादेव।

॥ जय राम ॥

National Motto for India : Satyamev Jayate or सत्यमेव जयते 

शनिवार, 16 जनवरी 2016

Swami Karpatri Ji Avtaran Diwas is Shravan Shukla Tritiya


Please update that according to hindi tithi calendar, the birth date of Dharamsamrat Swami Karpatri Ji Maharaj is Tritya...

Posted by धर्मसम्राट स्वामी करपात्री on Monday, 18 August 2014

रविवार, 8 नवंबर 2015

आज्यं मेधः गावस्तण्डुलाः

वेद ने विशेष रूपसे "गौ" को बार बार "अघ्न्या" कहा गया है ( इसीसे स्पष्ट है कि यज्ञार्थ वध्य पशुओं की भांति गो को अन्य पशुओं के सदृश नहीं ... है ) अतः स्पष्ट है कि किसी भी रूप में गाय का वध नहीं किया जा सकता |' मेध ' शब्द सर्वत्र हिंसा वाचक नहीं होता अन्यथा तो "सर्वमेध यज्ञ " में सभी (यजमानादि ) के वध्य की कल्पना प्रसक्त होने लगेगी , ''गोमेध'' शब्द में प्रयुक्त 'गो' शब्द गोविकार स्वरूप गोरस का वाचक है , अन्नं हि गौ: (- शतपथब्राह्मण ४/३/४/२५) , आज्यं मेधः गावस्तण्डुलाः (-अथर्ववेद ११/२/५) | एतावता गोमेध का अभिप्राय है कि आज्यादि गोरस की प्रधानता अन्न से जो यज्ञविशेष होता है , वही "गोमेध" है |
-पूज्य धर्मसम्राट स्वामी श्री करपात्री जी महाराज |
श्रुति में गौओं को अघ्न्या (अवध्य) कहा गया है, फिर भला किसके द्वारा ये मारने योग्या हो सकती हैं ? जो पुरुष गौ (गाय) अथवा बैलों को मारता है, वह महान पाप करता है -
अघ्न्या इति गवां नाम क एता हन्तुमर्हति |
महच्चकाराकुशलं वृषं गां वाssलभेत् तु यः || (- महाभारत,शान्तिपर्व २६२/४७ )

|| जय श्रीराम ||

रविवार, 1 नवंबर 2015

दो पीठ पर एक शंकराचार्य


स्वयं चतुर्मुख ब्रह्मा भी साक्षात् अवतरित हो जाएँ , तो वे भी दो पीठ पर एक शंकराचार्य का अभिषिक्त होना सही सिद्ध नहीं कर ...

Posted by Dharamsamrat Swami Karpatri Ji on Sunday, November 1, 2015

शनिवार, 31 अक्टूबर 2015

Sai Baba a saint only

#साईं_बाबा के प्रसंग पर ऐसा वक्तव्य (बयान) होना चाहिए -हे मनुष्यों ! आपके व्यक्तिगत पूज्य तो बहुत हो सकते हैं , जो आपक...

Posted by Dharamsamrat Swami Karpatri Ji on Friday, October 30, 2015

बुधवार, 28 अक्टूबर 2015

सनातन तीर्थ श्री नागेशी मंदिर, बंडोरा, फोंडा, गोआ, भारत

Location of the templeThis Temple is dedicated to Lord Shiva, the temple is situated in Bandora village, about four...

Posted by Bipin Chauhan on Sunday, October 25, 2015

सनातन तीर्थ श्री शांतादुर्गा मंदिर, कवळे, फोंडें, गोआ, भारत

Shri Shantadurga Temple is a large temple complex 33 km (21 mi) from Panaji at the foothill of Kavalem village in Ponda...

Posted by Bipin Chauhan on Sunday, October 25, 2015

सनातन तीर्थ श्री महालक्ष्मी मंदिर, बंडोरा, गोआ, भारत


Despite the Portuguese influence that dominated #Goa over the centuries, it is fascinating to see how such a large...

Posted by Bipin Chauhan on Sunday, October 25, 2015

शिवलिंग ! अश्लीलता या आध्यात्मिकता ?


Lingam #shivlingaअश्लीलता या आध्यात्मिकता ?शिवलिङ्ग के सन्दर्भ में लोकभ्रान्ति का सारभूत उन्मूलन https://shankarsandesh.wordpress.com/2015/10/27/146/|| जय श्री राम ||

Posted by Dharamsamrat Swami Karpatri Ji on Tuesday, October 27, 2015

मंगलवार, 7 जुलाई 2015

महाभाष्ये जन्मनावर्णवाद: (सामाजिक-मत-विखण्डनम्) -

महाभाष्ये जन्मनावर्णवाद: (सामाजिक-मत-विखण्डनम्) -
______________________________
यदुक्तं महाभाष्येsपि गुणशब्दा उक्तास्तस्माद् गुणकृतमेवब्राह्मण्यादिकमिति तदेतन्महाभाष्याद्यज्ञानविजृम्भितम् | तपः श्रुतञ्च योनिश्चेति वचनविरोधात् | अथवा छद्मनामूढजनप्रतारणाय तपः श्रुतं चोक्त्वा योनिश्चेति नोक्तम् | तथाहि नञ् (पा०सू० २/२/६ ) इत्यत्र किं प्रधानोsयं समास इत्युपक्रान्तः |
अत्र प्रदीपे - ‘ इहा ब्राह्मणादिना क्षत्रियादेरभिधानं लोके दृश्यते | तत्र प्रक्रियागतगुणदोषनिरूपणाय प्रश्नः | यदा जातौ ब्राह्मणशब्दो वर्तते अविद्यमानं ब्राह्मण्यं यस्य सोsब्राह्मणः क्षत्रियादिस्तदान्यपदार्थः प्रधानम् | एवं अन्यपदपूर्वपदोत्तरपदार्थप्राधान्यपक्षानुत्थाप्यानुपपत्तय उक्ताः | उत्तरपदार्थ प्राधान्यपक्षे पुनरपि अब्राह्मणमानयेत्युक्ते ब्राह्मणमात्रस्यानयनं प्राप्नोतीत्याक्षेपे तत्र राजपुरुषमानयेत्युक्ते पुरुषमात्रस्य कुतो नानयनमिति प्रतिक्षेपे “ यथा तत्र विशेषोsभ्युपेयते तथैवात्रापि नञ्विशेषको ब्राह्मणः प्रयुक्त इति तस्यैवानयनं न तु ब्राह्मणमात्रास्येति समाहितम् |
“कः पुनरसौ इति” पृष्टे निवृत्तिपदार्थकः इति समाहितमेवं प्रश्नप्रतिवचनपरम्परयाsन्यदपि बहूक्त्वा “पश्चादर्थप्रत्यानयनाय शब्दः प्रयुज्यते | स चेन्निवृत्तः किमर्थं प्रयुज्यत” इत्युक्तम् | ततः प्रतिषेधविषयप्रदर्शनाय बुद्ध्या ब्राह्मणार्थं निरूप्य तस्य क्षत्रियादौ मुख्यसत्ताविरहप्रतिपादनाय नञ्सहितो ब्राह्मणशब्द: प्रयुक्त इत्युक्तम् |
यस्यैव गुणस्य स्वाभाविकी निवृत्तिः क्षत्रियादौ तस्यैवासौ नञा द्योत्यते | अवशिष्टानां गुणानामर्थात्सद्भावो गम्यते | अस्मिन् प्रसङ्गे महाभाष्यकार आह – “ सर्व एते शब्दा गुणसमुदायेषु वर्त्तन्ते | ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्र इति |
अत्र प्रदीपोक्तरीत्या गुणशब्दे धर्ममात्रं पराश्रयमुच्यते | अतएव योनिशब्दितं जन्मापि गुणसामुदायान्तर्गतम् | तेन नात्र जन्मनिरपेक्षं मुख्यं ब्राह्मण्यमुक्तम् | तथा च महाभाष्यकृतैवोद्धृतं स्मृतिशास्त्रम् -
तपः श्रुतञ्च योनिश्चेत्येतद् ब्राह्मणकारणम् |
तपः श्रुताभ्यां यो हीनो जाति ब्राह्मण एव सः || (-महाभाष्य २/२/६ )
अत्र प्रदीपः - तपः चान्द्रायणादिकर्म, श्रुतं वेदवेदाङ्गादीनामध्ययनम् , योनिः ब्राह्मणाद् ब्राह्मण्यां जन्म ब्राह्मणकारणम् ब्राह्मणव्यपदेशस्येतन्निमित्तम् | गुणसमुदायाभावेsपि तदेकदेशे प्रयोगदर्शनादाह –
तपः श्रुताभ्यां यो हीनो जातिब्राह्मण एव सः || इति ||
अस्तु,
हर हर महादेव !
|| जय श्री राम ||

“स्वामी दयानन्द के काशी – शास्त्रार्थ की पोल – पट्टी (सप्रमाण ) “

तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत् , त्रयीवस्तुव्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासु तनुषु ।
अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीँ, विहन्तुं व्याक्रोशीँ विदधत इहैके जडधियः ॥ _/\_

प्रिय  मित्रों  !  


यद्यपि  स्वामी  दयानन्द    के  काशी-शास्त्रार्थ  की  यथार्थता    से   समस्त प्रौढ़   पौराणिक  जगत्   सर्वथा   सुपरिचित  ही  है  कि  कैसे  काशी   की  प्रतिभावान् पंडितमण्डली  ने   एक  -एक  करके  स्वामी  दयानंद    को   छब्बे  जी  से  दूबे  जी   वाली   कहावत का  पात्र  सिद्ध  किया    था   ,    एक    के  बाद  एक  काशी  के   पण्डितों  ने  स्वामी  दयानंद  को  धुल  चटाई   तथापि  कुछ   आर्य -समाजी  इसे  तोड़मरोड़  कर   और  इसकी  मौलिकता  को    अपने  मनोवांछित  शब्दजाल  से  ढक  कर   पाठक  के  सम्मुख    प्रस्तुत  करके  अपनी  मनोव्यथा  हल्की  करने  का   असफल    प्रयास  करते  रहते  हैं | 
ऐसा  ही  एक  उदाहरण  इस  अंतर्जाल  के  माध्यम  में  देखने  को  मिला  है  ,  यथा  –
http://www.aryamantavya.in/kashi-debate-of-swami-dayanand/ 


इन  सब  ओछी  छल  -छद्म – धूर्तताओं  से    यथार्थावेत्ता  विज्ञ  पौराणिक  जगत् को  तो  कोई  लेना-देना  नहीं  रहता  किन्तु  सत्य -सनातन-वैदिक-हिन्दू – धर्म  पर  आस्थान्वित  मृदुमेधा  वाले   नव जिज्ञासुओं  में  कदाचित्  भ्रम  की  स्थिति  हो  जाती  है  ,  प्रायः  लोक  में  भी  देखा  जाता  है  कि  बार-बार   उद्घोष  करके   बोलने  से  असत्य  भी  अलातचक्र  की  भांति   सत्य  सा  प्रतीत  होने  लगता  है  तद्वत  |इसीलिये  इस  सम्पूर्ण  मिथ्या  प्रलापों  और  आक्षेपों    का   हम  सप्रमाण   भ्रम –  भंजन  करेंगे  |  इसके लिए  हमने  ये  निर्णय  किया  है  कि  हम  काशी  शास्त्रार्थ  का  पौराणिक – संस्करण  न  उठाकर  समाजी – संस्करण  (  संवत्  १९३७  (सन् १८८०  ) में  वैदिक  यन्त्रालय  ,  काशी  से  प्रकाशित    निर्वाण  शताब्दी  संस्करण  )  के    मान्य  संवादों  को    आधार  बनाकर      ही  इनका  भ्रमोच्छेद  करेंगे  !  


यद्यपि  इस  संस्करण  में    समाजी  –  मण्डली ने     सर्वत्र    काट-छांट  कर    जगह  -जगह  अपने  मनोवांछित  शब्दों  से   व्याख्याओं  की  टिप्पणियाँ    आदि  डाल  -डाल  कर  दिन  को  रात  सिद्ध  करने  का   खूब  प्रयास  किया  है,  शास्त्रार्थ   प्रदर्शन   से  पूर्व   एक  लम्बी  भूमिका   में  अपना  विधवा-  विलाप ,    स्वामी  दयानंद का  मिथ्या  यशोगान   लिख  डाला    है    किन्तु  वेदमन्त्र  की  वो  सूक्ति  सुप्रसिद्ध  ही  है  कि    ”  सत्यमेव  जयते  नानृतम् ”  तात्पर्य  यह  है  कि    अनृत (  असत्य  )  चाहे    कितना  ही  प्रयास  कर  ले  किन्तु  सत्य  का  उत्कर्ष   तो  फिर  भी   हो  ही   जाता  है  |   यही  इन  समाजियों  के  साथ  भी  हुआ  है  ,  ये  बेचारे   चाह  कर  भी  अपने  स्वामी  दयानंद  का   पंगु  शास्त्र  ज्ञान  ,  धूर्तता  ,  छल  -प्रपंच एवं   येन -केन -प्रकारेण  प्रसिद्धः  पुरुषो  भवेत्  के  असफल  प्रयासों  को  इतनी  धांधलियों  के  उपरान्त  भी   छिपा    नहीं   पाए  हैं  |   

एक  सामान्य  सा  निष्पक्ष  विचारक  भी आसानी से  ये  समझ  सकता  है  कि जब  काशी – शास्त्रार्थ  में  स्वामी  दयानंद  का  ही  पलड़ा  सर्वत्र    भारी   रहा  है    तो  तुम  समाजी  लोग  अपने  काशी – शास्त्रार्थ  संबंधी  पुस्तकों या  लेखों  में   उस  पर  तरह  -तरह  की  व्याख्याएं ,    लम्बी  -लम्बी   टिप्पणियाँ   आदि  क्यों  घुसेड़ते  हो  ?  सीधा  सीधा  केवल  संवाद  मात्र  क्यों  नहीं  प्रस्तुत  कर  देते  ?   पाठक   उस  संवाद  को   पढ़कर   अपने  आप  ही    समझ  जाएगा  कि  कौन  सा  पक्ष  मजबूत  है  और  कौन  सा  शिथिल  !!  क्यों  इतनी  लम्बी – लम्बी  टिप्पणियां    ,  यहाँ  पर  स्वामी  जी  का  अभिप्राय  ये  है  ,  ये  सो  लिखते  हो  ?? 

  तुम्हारी   चोर  की  दाड़ी  में  तिनका तो      तुम्हारी  ये  शास्त्रार्थ – संवाद   में  नीचे  ऊपर  दायें  बाएं  लिखी  संवाद  से   भी   दोगुनी   टिप्पणियाँ  अथवा  व्याख्याएं   स्वयं  ही  साबित  कर  देती  हैं  | किं बहुना  ? 

 खैर  ,  पुनः  देखिये  आगे   यथार्थता   –

 

यह  शास्त्रार्थ  कार्तिक  सुदी  १२  सं०  १९२६  (तदनुसार  सन् १८६९ )  ,  मंगलवार  को  शुरू  हुआ  ,  शास्त्रार्थ  शुरू  होने  से  पूर्व  ही    अपने  खोखले  वेदज्ञान    के  घमण्ड  में  चूर    स्वामी  दयानंद  ने  काशीनरेश    से    यह  पूछा   कि  क्या  पण्डित  मण्डली  पुस्तक  लाई  है  या  नहीं  ? (वेदानां  पुस्तकान्यानीतानि  न  वा  ? ) ,  तब  काशी  के  पंडितों  की  रग-रग  से  सुपरिचित    काशीनरेश  ने   कहा  कि  वेद  तो   सम्पूर्ण  पंडितों  को  कंठस्थ  है  ,  फिर भला  पुस्तकों  का  क्या  प्रयोजन  है  ?     (वेदाः  पण्डितानां कंठस्थाः  सन्ति ,  किं  प्रयोजनं  पुस्ताकानामिति ?)  जब  काशी    के  पण्डितों  की  विद्वत्ता  को    स्वामी  दयानंद  ने  सुना  तो  खिसिया  कर  बोले  कि    पुस्तक  के  बिना  पूर्वापर  प्रकरण  का   ठीक  से   विचार   नहीं  हो  सकता   |  (पुस्तकैर्विना  पूर्वापरप्रकरणस्य यथावद्विचारस्तु  न  भवति  )    अब  आप  विचारक  महानुभाव  ज़रा  स्वामी  दयानन्द  के  इस  वक्तव्य  पर  विचार  कीजिये  ,  भला  ,  जब  स्वामी  दयानंद  स्वयं  पुस्तक  लेकर  आये  थे   तो  उनको  पूर्वापर   प्रकरण  के  लिए  काशी  के  पंडितों  की  पुस्तक  की  आवश्यकता  क्यों   पड़    गयी  ?  क्या  अपनी  पुस्तक  से  पूर्वापर  प्रकरण  नहीं  देख  सकते  थे  ?    और  यदि  जब  स्वयं  ही  पुस्तक  नहीं  लेकर  आये  तो  किस  मुंह  से  प्रतिपक्ष  से  पुस्तक   लाने  की  अपेक्षा  कर    रहे  हैं  ?  

 कुल मिलाकर   वास्तविकता  यह  थी  कि    स्वामी  दयानंद  को  लगता  था  कि  काशी  के  पंडित  भी  उनकी  ही  तरह  से     बिना  गाँठ  के  पंसारी  होंगे  ,  जिनको  येन  -केन  प्रकारेण  छल  छद्मता  आदि  कूटनीतिक  प्रयोग  से   पराजित  कर  सारे  सनातन  धर्म  पर  अपना  एकछत्र   प्रभुत्व  जता  लूंगा  ,  किन्तु  जब  काशीनरेश  के  मुख  से  सुना  कि  काशी  के  पंडित  तो    वेदों  को  कंठ  में  लिए  रहते   हैं  तो  बेचारे  दयानंद  की  आशा  हताशा  में बदल  गयी  ,  जिसे  छुपाने  के  लिए  स्वामी  दयानन्द  ने पूर्वापरप्रकरण का  कुतर्क  प्रस्तुत  किया |  

(स्वामी  दयानंद  का  यह  पुस्तक  वाला  पोप  – प्रपंच     आगे    शास्त्रार्थ   के  मध्य  में  आपको   और  अधिक     सुस्पष्ट  हो  जाएगा  ,  जब  ये  अपने  ही    जाल  में  फंस  कर   अपने   खोखले  वेदज्ञान  के  कारण   विद्वानों  से  वेद   की   पुस्तक   मागेंगे     ,  देखिएगा  आगे सप्रमाण    )|   


जब  स्वामी  दयानन्द  ये  समझ  गए  कि  यहाँ   वेद  की   पुस्तक  कोई  पंडित  नहीं  लाने  वाला  है,  यहाँ  तो सबके  कंठ   में  वेद  बसे  हैं    तो उनके  सामने  कहीं  मेरी  पोल  न  खुल  जाए  इस  भय  से    बेचारे  स्वामी दयानंद हताशा  छिपाकर  बोले  कि  कोई  बात  नहीं  अगर  पुस्तक  नहीं  लाते  तो  (अस्तु तावत्    पुस्तकानि   नानीतानि | ) 

( वाह  रे  स्वामी  दयानंद  !  पहले  स्वयं  ही   पूर्वापरप्रकरण  दर्शन  की  अनिवार्यता   हवाला  देकर  पुस्तक  मंगवाओ  ,  फिर  स्वयं    ही  कहो  कि  कोई  बात  नहीं  ,  काशी  नरेश  से  पण्डितों  की  विद्वत्ता  का  परिचय  सुनकर  तो  शुरुआत  में  ही   स्वामी  दयानन्द  के  होश  ढीले  हो  गए  !  )


अब शास्त्रार्थ  शुरू  हुआ  –  स्वामी  दयानन्द  ने   पहले  ही  स्पष्ट  कर  दिया  था  कि  मैं  एक  से  अधिक  लोग  होने  पर    प्रश्नों  का   उत्तर  नहीं  दूंगा  , तो  रघुनाथ  प्रसाद  कोतवाल    ने ये  नियम  किया  कि  स्वामी  जी  से  एक  -एक  करके  पंडित  विचार  करें  |

  (तदा  पण्डित रघुनाथप्रसादकोटपालेन नियमः  कृतो  दयानन्दस्वामिना   सहैकैकः  पण्डितो  वदतु  न  तु  युगपदिति |  )

इस  नियम  के  ही  आधार  पर  सबसे  पहले  पंडित  श्री ताराचरण  भट्टाचार्य  “तर्करत्न”   स्वामी  दयानंद  के  सम्मुख  विचार  हेतु  प्रस्तुत  हुए  | 

 (  यहाँ  पर  यह  स्पष्ट  है  कि  आर्य  समाजी  जो  बोलते  हैं  कि  काशीशास्त्रार्थ  में  काशी    के  पंडित  एक  साथ  भीड़  बनाकर    स्वामी  दयानंद  से  शास्त्रार्थ  के  नाम  पर   उलझे   थे  ,  वह  इन  धूर्त  समाजियों  का  काशी  के  पण्डितों  के  प्रति  अपना  व्यक्तिगत  द्वेषमात्र  है |  जबकि  यथार्थता  यह  थी  कि  एक  एक  करके  सबने दयानंद   का  झूठापन  और  उनकी    धूर्तता   को  सिद्ध  किया  था    ) 

 


अस्तु  ,  अब  आगे  सुनिए   स्वामी   दयानन्द  को धूल   चटाने  वाला प्रामाणिक     रोचक काशी – शास्त्रार्थ – संवाद   –

(……शेष  क्रमशः  ) |


धर्म  की  जय  हो  !  अधर्म  का  नाश  हो  !प्राणियों  में सद्भावना  हो  ! विश्व  का  कल्याण  हो! गोहत्या  बंद  हो ! गोमाता  की  जय  हो  ! हर  हर  महादेव  !  ||जय  श्री  राम  ||

वेदार्थपारिजात – खण्ड ०२

वेदार्थपारिजात  का  द्वितीय  खंड  आप  सभी के  सम्मुख  प्रस्तुत  करते  हुए  अपार  हर्ष  हो  रहा  है  , यह  खंड  जहां  समस्त  विधर्मियों  ,  अधर्मियों  आदि  के  दुरभिमान  को  खंड  खंड  कर  देगा  ,  वही  सत्य -सनातन-वैदिक   धर्म  अनुयायियों  को  अथाह  रूप  से   प्रमुदित  करेगा  ,    ऐसा  विश्वास  है |
।।श्री धर्मसम्राट्-स्तवनम्।।
आदित्यो-निजतेजसा हिमकर-स्तापापनोदेन वै,  भौमः शत्रुविदारणेन-सततं सौम्यश्च ज्ञानाकरैः।
वाण्या देवगुरुःकविःसुतपसा सौरिश्च सत्येन यः, इत्थं सर्वविधैःग्रहैः विलसितःश्रीपाणिपात्रो यतिः।।१।।
स्वकीय तेजस्विता से जो सूर्य,मानव मन के संतापों को निश्चित दूर करने में जो चन्द्र,शास्त्र विरोधियों के  अभिमतों को विदीर्ण करने में (सेनापतित्वात्)भौम,ज्ञान संपदा में बुध,शास्त्र पूत वक्तृता में देवगुरु वृहस्पति,तपस्या में कविवर शुक्राचार्य,सत्य भाषण एवं न्यायप्रियता में शनिदेव,के समान हैं,ऐसे सर्वविध ग्रहों के तेज से सुशोभित पूज्य श्री करपात्री जी महाराज का दिव्य स्वरूप है।१।।
भक्त्या-भूषित-मानसं यतिवरं वैराग्य-वोधाश्रयं,ज्ञानाकाश-विभासकं-पटुतमं विज्ञान-भा-भासुरम्।
सिद्धान्त-प्रतिपादने प्रतिपलं संरक्षणे तत्परं, वन्दे ज्ञानदिवाकरं हरिहरानन्दं सदा श्रद्धया।।२।।
भक्ति से भूषित मन वाले,ज्ञान-वैराग्य से संपन्न,ज्ञानाकाश को प्रकाशित करने वाले,विज्ञान के तेज से भासित अत्यन्त दक्ष,प्रतिपल सिद्धान्त के प्रतिपादन एवं संरक्षण में तत्पर,ज्ञानदिवाकर यतिश्रेष्ठ पूज्य श्री हरिहरानन्द सरस्वती जी महाराज को में सदा श्रद्धापूर्वक नमन करता हूं।।२।।
यो दृष्टवा भवसागरे निपतितं मोहान्धकारे जगत्, अज्ञाना-वृतमानसं विचलितं पाखण्ड पंकेरतम्।
कारुण्येन समागतो नरवरे तद्रक्षितुं यः स्वयं, पूज्यो भावभरैःनृभिःप्रतिदिनं श्रीपाणिपात्रो यतिः।।३।।
अज्ञान से घिरे हुए,अतएव विचलित हो पाखण्ड रूपी कीचङ से आवृत,प्राणियों को मोहान्धकार रूपी भवसागर में पङे हुए देखकर करुणा से द्रवीभूत हो इस जगत की रक्षा के लिये,जो स्वयं १नरवर में आये,ऐसे पूज्य श्री करपात्री जी महाराज समस्त प्राणियों के द्वारा भावपूर्वक नित्य पूजनीय(प्रणम्य) हैं।।
१ -यद्यपि पूज्य श्री की अवतरण स्थली भटनी प्रतापगढ यूपी है,तदपि यहां नरवर को वरीयता देने का तात्पर्य है,जन्म के दो प्रकार शास्त्रों में कहे गये हैं, १ -विन्दु २ -नाद,(द्विधा वंशो विद्यया जन्मना च)पूज्य श्री का पावन यश विन्दु कुल की अपेक्षा नाद (विद्या,ज्ञान)कुल के कारण ही है,नरवर पूज्य श्री का विद्याकुल गुरुकुल है।
आर्यभ्रान्ति निवारणैक-कुशलो लोकस्य संरक्षकः, शास्त्रार्थ-प्रतिपादने च निरतो वादादि संयोजने।
जात्या वर्णविधिर्न कर्मविहितः शास्त्रेष्वियानेव वाक्, इत्याख्यैः सुवचैः प्रतिष्ठितयशाः श्रीपाणिपात्रो यतिः।।४।।
तथाकथित आर्य जनों के विचारों में आयी भ्रान्तियों के निवारण में कुशल,लोक के संरक्षक,शास्त्रों के परमपरागत समुचित अर्थ का प्रतिपादन करने तथा(वादे वादे जायते तत्व बोधः इस सिद्धान्त का अनुसरण करते हुये) शास्त्रीय पक्ष का निर्धारण करने के लिये विचार गोष्ठी आयोजित करने में निरत,वर्ण व्यवस्था जन्म से होती है न कि कर्म से शास्त्रों में यही सिद्धान्त स्पष्टतया  सर्वथा वर्णित है,इत्यादि सम्यक मतों के प्रतिपादन से लब्ध प्रतिष्ठ पूज्य श्री करपात्री जी महाराज वन्दनीय हैं।
संसारानल-तप्तमानसवतां कोसौ सुधानिर्झरः, भक्तानां-भगवानपूर्व-रुचिरो-वात्सल्य-कल्पद्रुमः।
मोहग्राहग्रहीतमानसवतां मोक्षार्थ विद्यामणिः, सर्वाशापरिपूरको हरिहरो श्रीपाणिपात्रोयतिः।।५।।
संसाराग्नि में झुलसते प्राणियों को शीतलता प्रदान करने के लिये ये सुधा निर्झर के रूप में कौन हैं,भक्तोंके लिये अपूर्व मनोहर सर्वाशापरिपूरक भगवान,महामोह रूपी ग्राह के द्वारा जकङे हुये मन वाले प्राणियों की मुक्ति के लिये जो विद्या मणि हैं,(ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः) वात्सलता के कल्पतरु श्रीहरिहरानन्द सरस्वती स्वामीश्री करपात्री जी महाराज वन्दनीय हैं।।५।।
शैवानां-शिवतत्वनिष्ठ-रुचिरःसीताधवो राघवः, शाक्तानां समतामयश्च मधुहा राधाधवोमाधवः।
विष्णौ भक्तिमतां सतां शिवकरःश्रीवैष्णवःशंकरः, नोमेशो न हरी असौ हरिहरःसाक्षाद्यतीन्द्राधिराट् ।। ६ ।।
मानो शैवों में श्रेष्ठ शिवतत्व निष्ठ भगवतीसीता के स्वामी श्रीराम हैं,अथवा शाक्तों में समत्वभाव रखने वाले,मधुहन्ता राधावर श्रीकृष्ण हैं,या भगवान विष्णु में भक्ति भाव रखने वाले,सज्जनों का कल्याण करने वाले,श्रीवैष्णव देवाधिदेव महादेव ही हैं,अरे नहीं,ये न तो उमापति शिव हैं, न राम कृष्ण हैं, ये तो साक्षात् यतीश्वरो के भी अधिनायक पूज्य श्री हरिहरानन्द सरस्वती स्वामी श्री करपात्री जी महाराज हैं।
(१ हरिश्च हरिश्च इति हरी-श्रीराम कृष्णौ,)
धर्मस्य प्रगतिर्भवेदवनतिर्भूयादधर्मस्य च,सद्भावो मनुजेषु वै खलु सदा लोकस्य भद्रं भबेत्।
गोमातुर्विजयोभवेदथ च गोहत्या निरुद्धा भवेत्,इत्थं घोषकरः सदा विजयते योगीन्द्रवृन्दाधिराट्।।७ ।।
धर्म की जय हो,अधर्म का नाश हो,प्राणियों में सदद्भावना हो,विश्व का कल्याण हो,गौ माता की जय हो,गो हत्या बन्द हो,इस प्रकार की घोषणाओं से जनमानस के हृदय में दिव्य भाव का जागरण करने वाले,योगीकुल के अधिपति पूज्य श्री करपात्री जी महाराज की सदा जय हो,
श्रीविद्यासमुपासकं गुरुवरं यज्ञात्मकं सिद्धिदं,धर्माधर्मविवेचकं श्रुतिपरं शान्तं परं दैवतम्।
सिद्धान्तप्रतिमा-सनातनवपुः श्रीशंकरं नूतनं,पद्यैरष्टभिरद्य नौमि वचसा श्रीपाणिपात्रं यतिम्।।८।।
श्रीविद्या के समुपासक, यज्ञस्वरूप,वेद शास्त्र परायण,धर्म एवं अधर्म के समर्थ व्याख्याता,सिद्धिप्रदान करने वाले परम दैव,सनातन धर्म के सिद्धान्तों के साक्षात् विग्रह,शास्वत सत्ता वाले अभिनव शंकर,श्रीकरपात्री जी महाराज को अष्ट पद्य प्रसूनात्मक वाणी के द्वारा आज नमन करते हैं,।
अष्टपाशनिराशाय,सर्वेष्टसाधनायच।                                                                                                                                                    अन्तःकरण-शुद्ध्यर्थं-मयाकारि तदष्टकम्।।९ ।।
अष्ट पाशों के विनाश के लिये, सर्व इष्ट सिद्धि के लिये,तथा अन्तःकरण की शुद्धि के लिये मेरे द्वारा ये अष्टक रचा गया ।
( साभार : श्रीगुरुकृपाधनसम्पन्नः त्र्यम्बकेश्वरश्चैतन्यः )
वेदार्थपारिजात ,  खण्ड   -०२
vedartha parijatah part-2
धर्म की जय हो !
अधर्म का नाश हो !
प्राणियों में सद्भावना हो !
विश्व का कल्याण हो !
गोहत्या बंद हो !
गोमाता की जय हो !
हर हर महादेव !
। । जय श्री राम । ।

“वेदार्थपारिजात “


।।श्री धर्मसम्राट्-स्तवनम्।।
आदित्यो-निजतेजसा हिमकर-स्तापापनोदेन वै,  भौमः शत्रुविदारणेन-सततं सौम्यश्च ज्ञानाकरैः।
वाण्या देवगुरुःकविःसुतपसा सौरिश्च सत्येन यः, इत्थं सर्वविधैःग्रहैः विलसितःश्रीपाणिपात्रो यतिः।।१।।
स्वकीय तेजस्विता से जो सूर्य,मानव मन के संतापों को निश्चित दूर करने में जो चन्द्र,शास्त्र विरोधियों के  अभिमतों को विदीर्ण करने में (सेनापतित्वात्)भौम,ज्ञान संपदा में बुध,शास्त्र पूत वक्तृता में देवगुरु वृहस्पति,तपस्या में कविवर शुक्राचार्य,सत्य भाषण एवं न्यायप्रियता में शनिदेव,के समान हैं,ऐसे सर्वविध ग्रहों के तेज से सुशोभित पूज्य श्री करपात्री जी महाराज का दिव्य स्वरूप है।१।।
भक्त्या-भूषित-मानसं यतिवरं वैराग्य-वोधाश्रयं,ज्ञानाकाश-विभासकं-पटुतमं विज्ञान-भा-भासुरम्।
सिद्धान्त-प्रतिपादने प्रतिपलं संरक्षणे तत्परं, वन्दे ज्ञानदिवाकरं हरिहरानन्दं सदा श्रद्धया।।२।।
भक्ति से भूषित मन वाले,ज्ञान-वैराग्य से संपन्न,ज्ञानाकाश को प्रकाशित करने वाले,विज्ञान के तेज से भासित अत्यन्त दक्ष,प्रतिपल सिद्धान्त के प्रतिपादन एवं संरक्षण में तत्पर,ज्ञानदिवाकर यतिश्रेष्ठ पूज्य श्री हरिहरानन्द सरस्वती जी महाराज को में सदा श्रद्धापूर्वक नमन करता हूं।।२।।
यो दृष्टवा भवसागरे निपतितं मोहान्धकारे जगत्, अज्ञाना-वृतमानसं विचलितं पाखण्ड पंकेरतम्।
कारुण्येन समागतो नरवरे तद्रक्षितुं यः स्वयं, पूज्यो भावभरैःनृभिःप्रतिदिनं श्रीपाणिपात्रो यतिः।।३।।
अज्ञान से घिरे हुए,अतएव विचलित हो पाखण्ड रूपी कीचङ से आवृत,प्राणियों को मोहान्धकार रूपी भवसागर में पङे हुए देखकर करुणा से द्रवीभूत हो इस जगत की रक्षा के लिये,जो स्वयं १नरवर में आये,ऐसे पूज्य श्री करपात्री जी महाराज समस्त प्राणियों के द्वारा भावपूर्वक नित्य पूजनीय(प्रणम्य) हैं।।
१ -यद्यपि पूज्य श्री की अवतरण स्थली भटनी प्रतापगढ यूपी है,तदपि यहां नरवर को वरीयता देने का तात्पर्य है,जन्म के दो प्रकार शास्त्रों में कहे गये हैं, १ -विन्दु २ -नाद,(द्विधा वंशो विद्यया जन्मना च)पूज्य श्री का पावन यश विन्दु कुल की अपेक्षा नाद (विद्या,ज्ञान)कुल के कारण ही है,नरवर पूज्य श्री का विद्याकुल गुरुकुल है।
आर्यभ्रान्ति निवारणैक-कुशलो लोकस्य संरक्षकः, शास्त्रार्थ-प्रतिपादने च निरतो वादादि संयोजने।
जात्या वर्णविधिर्न कर्मविहितः शास्त्रेष्वियानेव वाक्, इत्याख्यैः सुवचैः प्रतिष्ठितयशाः श्रीपाणिपात्रो यतिः।।४।।
तथाकथित आर्य जनों के विचारों में आयी भ्रान्तियों के निवारण में कुशल,लोक के संरक्षक,शास्त्रों के परमपरागत समुचित अर्थ का प्रतिपादन करने तथा(वादे वादे जायते तत्व बोधः इस सिद्धान्त का अनुसरण करते हुये) शास्त्रीय पक्ष का निर्धारण करने के लिये विचार गोष्ठी आयोजित करने में निरत,वर्ण व्यवस्था जन्म से होती है न कि कर्म से शास्त्रों में यही सिद्धान्त स्पष्टतया  सर्वथा वर्णित है,इत्यादि सम्यक मतों के प्रतिपादन से लब्ध प्रतिष्ठ पूज्य श्री करपात्री जी महाराज वन्दनीय हैं।
संसारानल-तप्तमानसवतां कोसौ सुधानिर्झरः, भक्तानां-भगवानपूर्व-रुचिरो-वात्सल्य-कल्पद्रुमः।
मोहग्राहग्रहीतमानसवतां मोक्षार्थ विद्यामणिः, सर्वाशापरिपूरको हरिहरो श्रीपाणिपात्रोयतिः।।५।।
संसाराग्नि में झुलसते प्राणियों को शीतलता प्रदान करने के लिये ये सुधा निर्झर के रूप में कौन हैं,भक्तोंके लिये अपूर्व मनोहर सर्वाशापरिपूरक भगवान,महामोह रूपी ग्राह के द्वारा जकङे हुये मन वाले प्राणियों की मुक्ति के लिये जो विद्या मणि हैं,(ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः) वात्सलता के कल्पतरु श्रीहरिहरानन्द सरस्वती स्वामीश्री करपात्री जी महाराज वन्दनीय हैं।।५।।
शैवानां-शिवतत्वनिष्ठ-रुचिरःसीताधवो राघवः, शाक्तानां समतामयश्च मधुहा राधाधवोमाधवः।
विष्णौ भक्तिमतां सतां शिवकरःश्रीवैष्णवःशंकरः, नोमेशो न हरी असौ हरिहरःसाक्षाद्यतीन्द्राधिराट् ।। ६ ।।
मानो शैवों में श्रेष्ठ शिवतत्व निष्ठ भगवतीसीता के स्वामी श्रीराम हैं,अथवा शाक्तों में समत्वभाव रखने वाले,मधुहन्ता राधावर श्रीकृष्ण हैं,या भगवान विष्णु में भक्ति भाव रखने वाले,सज्जनों का कल्याण करने वाले,श्रीवैष्णव देवाधिदेव महादेव ही हैं,अरे नहीं,ये न तो उमापति शिव हैं, न राम कृष्ण हैं, ये तो साक्षात् यतीश्वरो के भी अधिनायक पूज्य श्री हरिहरानन्द सरस्वती स्वामी श्री करपात्री जी महाराज हैं।
(१ हरिश्च हरिश्च इति हरी-श्रीराम कृष्णौ,)
धर्मस्य प्रगतिर्भवेदवनतिर्भूयादधर्मस्य च,सद्भावो मनुजेषु वै खलु सदा लोकस्य भद्रं भबेत्।
गोमातुर्विजयोभवेदथ च गोहत्या निरुद्धा भवेत्,इत्थं घोषकरः सदा विजयते योगीन्द्रवृन्दाधिराट्।।७ ।।
धर्म की जय हो,अधर्म का नाश हो,प्राणियों में सदद्भावना हो,विश्व का कल्याण हो,गौ माता की जय हो,गो हत्या बन्द हो,इस प्रकार की घोषणाओं से जनमानस के हृदय में दिव्य भाव का जागरण करने वाले,योगीकुल के अधिपति पूज्य श्री करपात्री जी महाराज की सदा जय हो,
श्रीविद्यासमुपासकं गुरुवरं यज्ञात्मकं सिद्धिदं,धर्माधर्मविवेचकं श्रुतिपरं शान्तं परं दैवतम्।
सिद्धान्तप्रतिमा-सनातनवपुः श्रीशंकरं नूतनं,पद्यैरष्टभिरद्य नौमि वचसा श्रीपाणिपात्रं यतिम्।।८।।
श्रीविद्या के समुपासक, यज्ञस्वरूप,वेद शास्त्र परायण,धर्म एवं अधर्म के समर्थ व्याख्याता,सिद्धिप्रदान करने वाले परम दैव,सनातन धर्म के सिद्धान्तों के साक्षात् विग्रह,शास्वत सत्ता वाले अभिनव शंकर,श्रीकरपात्री जी महाराज को अष्ट पद्य प्रसूनात्मक वाणी के द्वारा आज नमन करते हैं,।
अष्टपाशनिराशाय,सर्वेष्टसाधनायच।                                                                                                                                                    अन्तःकरण-शुद्ध्यर्थं-मयाकारि तदष्टकम्।।९ ।।
अष्ट पाशों के विनाश के लिये, सर्व इष्ट सिद्धि के लिये,तथा अन्तःकरण की शुद्धि के लिये मेरे द्वारा ये अष्टक रचा गया ।
( साभार : श्रीगुरुकृपाधनसम्पन्नः त्र्यम्बकेश्वरश्चैतन्यः )

प्रातः स्मरणीय परमपूज्य  श्रीमदाचार्यवर्य (परमपूज्य  धर्मसम्राट् स्वामी  श्री  करपात्री  जी महाराज जी )  की  कृपा – प्रसादी –

Vedartha-Parijata-1 (1)
धर्म की जय हो !
अधर्म का नाश हो !
प्राणियों में सद्भावना हो !
विश्व का कल्याण हो !
गोहत्या बंद हो !
गोमाता की जय हो !
हर हर महादेव !
। । जय श्री राम । ।

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लीजिये_आर्यसमाज_का_अन्त‬

अभिनव शंकर धर्मसम्राट् स्वामी श्री करपात्री जी महाराज की कालजयी रचना -
------------------|| वेदार्थ - पारिजात ||------------
https://shankarsandesh.files.wordpress.com/…/vedartha-parij…
प्रिय धर्मप्रेमी बंधुओं !
धर्मसम्राट् स्वामी श्री करपात्री जी की कालजयी रचना "वेदार्थ -पारिजात " जो दो खण्डों में विभाजित बहुत उत्कृष्ट , अद्भुत , प्रौढ़ ग्रन्थ है , यह ग्रन्थ आपके बीच लाकर आपका अहोभाग्य जगा रहा हूँ , काशी के सर्वश्रेष्ठ उद्भट विद्वानों ने इस पुस्तक के निर्माण में अपनी -अपनी यथायोग्य सेवा रूपी आहुति प्रदान की थी , इन आहुतियों से ये रचना रूपी प्रदीप्त अग्नि आर्य समाज का काल से महाकाल बन गयी थी | आर्य समाजी बार बार हम सनातनियों से शास्त्रार्थ में पराजित होते परन्तु पुनः अपनी धूर्तता से ये दुष्प्रचार करते कि मैं जीता मैं जीता , इनकी इसी धूर्तता के कारण इनकी एक रामबाण चिकित्सा हमारे पूज्य स्वामी जी ने की !! इसी अभेद्य पुस्तक ने आर्य समाज रूपी आसुरी विचारधारा के प्राण हरण कर सनातनियों और आर्य समाजियों के शास्त्रार्थ का सदा -सदा के लिए समाजी उपद्रव का अंत कर दिया था |
इसका उत्तर देने के लिए आर्य समाज के शीर्षस्थ आक्षेपक विशुद्धानंद नामक एक व्यक्ति ने वेदार्थ कल्पद्रुम लिखा था , जिसमे उस धूर्त विशुद्धानंद ने स्वामी करपात्री जी पर गालियों की बौछार कर डाली (जैसा कि आर्य समाजियों की आदत ही है , आप दो दूना चर कहो तो वो अपनी टी आर पी बचाए रखने के लिए पांच अवश्य बोलेगा ) , पर पारिजात की ईर्ष्या में लेखक की ईर्ष्या बुद्धि से उत्पन्न इस कल्पद्रुम का नाम ही इसे ले डूबा क्योंकि कल्पद्रुम की चर्चा पुराण सिद्धांत को प्रतिपादित करती है , स्वयं आर्य समाजी सिद्धांत के अनुसार कल्पद्रुम जैसे किसी वृक्ष का अस्तित्व नहीं है ) जिसका खंडन पारिजात वार्तिक में पुनः श्री निरंजन देव तीर्थ जी महाराज ने करके इति कर दी |
इस पुस्तक को आपके बीच में लाकर आप समझिये मैंने फेसबुक आदि से भी सारे आर्य समाज का सम्पूर्ण रूप से अंत कर दिया है !
मेरी आप सभी ब्राह्मण एवं अन्य हिन्दू धर्म प्रेमी मित्रों को ये अब तक की सबसे अनमोल भेंट होगी , ऐसा मेरा विश्वास है !!
एक बार आप सभी धर्म प्रेमी बन्धु मेरे साथ प्रेम से बोलेंगे - हर हर महादेव !
धर्म की जय हो ! अधर्म का नाश हो !प्राणियों में सद्भावना हो ! विश्व का कल्याण हो! गोमाता की जय हो ! हर हर महादेव !
|| जय श्री राम ||

शनिवार, 4 अप्रैल 2015

क्या दो पीठों पर एक शंकराचार्य होना उचित है ?

प्रश्न - क्या दो पीठों पर एक शंकराचार्य होना उचित है ?
उत्तर- जो व्यक्ति दो पीठों पर स्वयं को शंकराचार्य कहे , शास्त्रीय दृष्टि से वस्तुतः ऐसा व्यक्ति किसी भी पीठ का शंकराचार्य नहीं | सदाशिवावतार भगवान श्री आद्य शंकराचार्य के श्रीकरकमलों से प्रतिस्थापित हजारों वर्षों की चली आयी परम्परा को तोड़ कर , मठाम्नाय महानुशासनम् के सूर्यवत् सुस्पष्ट श्लोकों का यथार्थ कुतर्कों से बदलकर स्वच्छंद परम्परा आरोपित करने वाले, मर्यादा का विनाश करने वाले वस्तुतः सबसे बड़े अपराधी हैं | भगवान् श्री आद्य शंकराचार्य इन अपराधियों को कभी क्षमा नहीं करेंगे !
भगवान् श्री आद्य शंकराचार्य ने बहुत भाव से, बहुत श्रद्धा से चार पीठों पर चारों दिशाओं में चार शंकराचार्यों की परम्परा स्थापित की थी , जिसमे परमपूज्य आचार्य के भगवान नारायण की चार भुजाओं की भांति चार शिष्य स्वयं भगवान श्री आद्य शंकराचार्य द्वारा अधिरोहित किये थे | और उन चारों मठों के अलग -अलग विभाग बनाकर उनके अलग-अलग विधान भी स्वयं भगवान श्री आद्य शंकराचार्य द्वारा प्रकाशित किये थे | जो हमारे भारत देश में लाखों- लाखों घोर विपदाएं, विपरीत परिस्थितियाँ आने के बाद भी हजारों वर्षों से अद्यावधिपर्यन्त अक्षुण्ण रही , कभी ना बदली , ना ही परिवर्तित की गयी |
क्योंकि धर्मस्य प्रभुरच्युतः -धर्म के सुरक्षा करने में स्वयं भगवान नारायण सदैव तत्पर हैं |
.............आज झंडा उठाने वाले चार चेले खड़े कर , चार भोले व्यक्ति अपने साथ लुब्ध करके सत्य को ढकने की बाल्यता करने वाले ये भूल जाते हैं कि सनातन धर्म सत्य पर प्रतिष्ठित है , किसी जनबल अथवा दिखावटी प्रचार पर नहीं, यह जहां विद्यमान है , वहीं से स्वतः प्रकाशित होने वाला है |
इसके साथ किया गया तिलभर भी अन्याय कभी ढक नहीं सकता | आज नहीं तो कल वह प्रकाशित हो ही जाएगा | उसे पुनः ढकोगे तो कहीं अन्यत्र से वह प्रस्फुटित होगा , वहां दबाओगे तो फिर कहीं और से प्रस्फुटित होगा | अन्याय संचित धन जिस प्रकार समूल नष्ट होता है , उसी प्रकार अन्याय- आधारित राज्य भी समूल ही नष्ट हो जाता है |
............यही सत्य -सनातन -धर्म की अचिन्त्य महिमा है |
....... सत्यमेव जयते नानृतम् ||
|| जय श्री राम ||
By shankar sandesh

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद : - इन महाशय को कोई एक पीठ का शंकराचार्य बना दो बस , कुर्सी पर बैठने का सपना पूरा हो जाएगा !!!


Har Har Har Har Har Har Har
Jai Sanatan dharma Ki
Jai Sanātanī Gaudapada Dharam Samrat Swami Karpatri Ji Ki
Please read this thoroughly a nice review given by
Shankar Sandesh
For all Universe recommended by page admin
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद : -
इन महाशय को कोई एक पीठ का शंकराचार्य बना दो बस , केजरीवाल की तरह इस व्यक्ति का भी कुर्सी पर बैठने का सपना पूरा हो जाएगा !!!




Swaamishreeh avimukteshwaraanandah स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्दः

.......................अयोग्य नंबर एक !!!
यह शांकर सम्प्रदाय का दुर्भाग्य ही है कि ऐसे लोग इस परम पवित्र सम्प्रदाय का बोझ बढाते हैं !!
..........ऐसे भ्रष्ट और नाममात्रधारी संन्यासियों के हाथ में सनातन धर्म की बागडोर देने की सोचना भी सनातन -वैदिक - धर्म का सबसे बड़ा दुर्भाग्य कहा जा सकता है !!
एक सरल सा उदाहरण -
धर्मसम्राट करपात्री जी महाराज (जिन्होंने शूद्रों , म्लेच्छों के मंदिर प्रवेश मात्र से आहत होकर अपना मंदिर ही अलग बनवा लिया था) के नाम पर (चित्र लगाकर ) , प्रतिष्ठित संस्थानों से ऐसी पुस्तकें छपवाई जा रही हैं जहां तंत्रशास्त्रों से द्विजेतरों , शूद्रों के कलिकाल में आपातकालिक (आपातकाल प्राप्त होने पर ) संन्यास लेना उचित बताया जाता है और ईदृश वेदविरुद्ध वचनों को सहस्रश स्वीकृत किया जाता है ! क्योंकि धर्मसम्राट का विद्वत्समाज में नाम है और उनको ब्रांड बनाकर अपना दो पीठों पर जमे रहने का स्वार्थ साधना सबसे उत्तम उपाय है , ...... धिक् !!!
श्री आद्य शंकराचार्य भी कलिकाल में ही प्रकट हुए किन्तु वे वेदविरुद्ध तन्त्रशात्रों के वचनों का निषेध कर लोक में सनातन -वैदिक - धर्म की स्थिति को अक्षुण्ण रखे थे , स्वयं ब्रह्मसूत्र के द्वितीय अध्याय के द्वितीय पाद के अंत में ( जीवोत्पत्यादि के अनित्यत्व के प्रसंग में ) पांचरात्र इत्यादि तन्त्रशात्रों के वेदविरोधी वचनों का खण्डन कर वेदों की ध्वजा उन्नत किये थे , टीकाकार श्री आनंदगिरि भी मानते हैं कि वेद से अविरुद्ध होने पर ही तन्त्रशात्र का वचन मान्य होता है | वहीं दूसरी ओर ये आजकल के आधुनिक नकली शांकर जिनको मात्र मीडिया से ही अपना प्रचार करने का शौक है , कुर्सी के लोभ में हजारों वर्षों की गुरु- परम्परा को धूलि-धूसरित कर दो-दो पीठों पर एक शंकराचार्य बिठाने का समर्थन करते हैं , और जहां से वो हित सधे , वहीं डूबे रहकर प्रयास रत रहते हैं , सद्धर्मं रक्षा से जिनको कोई लेना-देना नहीं ; वेदविरोधी तंत्रशास्त्रों का समन्वय कर उसे देश काल परिस्थितियों के लिए उचित बताने वाले अपने चेलों को शुभाशंसा (आशीर्वाद ) प्रदान करते हैं |
इनकी दृष्टि में ऐसे द्विजेतरों (शूद्रों /म्लेच्छों आदि ) के लिए संन्यास विधान स्वीकारने वाले लोग बहुत उत्तम विद्वान हैं क्योंकि ऐसे लोग इनके कार्य सम्पन्न करने हेतु बुलाये जाते हैं | ( पुस्तक लेखक ने स्वामी स्वरूपानंद जी के कहने पर संन्यास आश्रम प्रवेश के समय इन (स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ) का कर्मकाण्ड सम्पन्न किया था )
आज इनकी यह उद्घोषणा है कि शूद्रों और म्लेच्छों को संन्यास देना भी संभव है , समयानुसार उचित है , कल यह संन्यास भी देना शुरू करेंगे (शायद कलिकाल का हवाला देकर शुरू भी कर चुके हों तो किं आश्चर्यम् ?? )
अधर्म को धर्म बोलकर धीरे-धीरे सनातन -वैदिक -धर्म की जड़ें खोद कर अपने स्वार्थ पूर्ण करने वाला कांग्रेसियों की संगत का असर आये तो इसमें आश्चर्य कैसा ?
वर्णाश्रम धर्म का कभी नाश नहीं होता , ये सदा थी, सदा है और सदा रहेगा , ये वो वैदिक धर्म है जो सदा रहने वाला है , इसीलिये इसे सनातन धर्म भी कहा जाता है |
..................कहा जाता है पाखण्ड और झूठ की शक्ति तो बहुत दीखती है किन्तु उसकी आयु बहुत कम होती है | 
धर्म की जय हो !
अधर्म का नाश हो !
हर हर महादेव !
जय जय शंकर , हर हर शंकर !
|| जय श्री राम ||

Posted by Bipin Chauhan on Saturday, April 4, 2015

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

Pt. Batuk Sharma offering Blessing to Blogger

Me with my Guru ! Pt. Batuk Sharma is one of the disciple(shishya) of Swami Karpatri Ji Maharaj. He has served Dharam Samrat Swami Karpatri Ji in his last times. Pt. Batuk Sharma is Gneral Seccretary of Kashi Vidhwat Parishad. He had been main Mahant of Tulsi Manas Mandir, Kashi for years. He is a great follower of Sanatan dharma lineage just like his Guru. May Bholenath always bless this live legend.

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

Notes

About


The one of Vibhuti name Karpatri Ji of Kashi.He was also known as “Dharamsamrat” which means emperor of righteousness & great scholar of Advaita Vedanta.

Biography

Swāmi Karpātrī born as Har Narayan Ojha in Bhatani Village, Pratpgarh District (his ancestors were from the Ojhoali Village of Barhalganj, Deoria District at present days and in old days same come under Gorakhpur District) area of eastern Uttar Pradesh, India was a monk in the Hindu Dashanami monastic tradition. His Grand Father Name was Pt. Amaanram Ji. His Father Name was Pt. Ramnidhi Ojha Ji and Mother Name was Shivrani Ji.His ancestors were the Rajguru in Bela Pratapgarh Kingdom, in present days a District of Uttar Pradesh, Dominion of India . His two brother named Harishankar and Harihar Prasad. His ordained name as a monk was Hariharananda Saraswati, but he was popularly known by the name Karpatri ("he who uses his hand as a food vessel") Swami. He was married and the father of a baby daughter when he left home at age 17 to seek ordination as a sannyasi (monk). After his years of learning, including three years in icy caves in the Himalaya, he was ordained as a monk. He was the pupil of the very famous Shankaracharya of Jyotirmath Swami Brahmananda Saraswati. He was also the founder of Dharma Sangha in Varanasi. He spent most of his life at Varanasi. He was a teacher in the Advaita Vedanta tradition of Hindu philosophy. Akhil Bharatiya Ram Rajya Parishad (Hindi: अखिल भारतीय राम राज्य परिषद, 'All India Council of Rama's Kingdom'), was a traditionalist Hindu party in India. It was founded by Swami Karpatri (1905–1980) in 1948. The Ram Rajya Parishad won three Lok Sabha seats in the 1952 elections and two in the 1962 elections. In 1952, 1957 and 1962, it won several dozen Vidhan Sabha seats, all in the Hindi belt, mostly in Rajasthan. Ram raja parishad was a Hindu traditional party, and not an Indian (or "Hindu") nationalist party. The RRP was dharmic, which significantly affected the political outlook of the party. Hindu dharma does not generally accept the (western) concept of a "nation-state" because dharma is said to permeate the entire universe, rather than demarcate people based on geo-political entity like state. Dharma concerns all living beings (âtman). There is a clear demarcation in Hinduism between nation and the state or the Rashtra and the Rajya. Like Hindutva, RRP wanted a common civil code in India, based on Manava-Dharma-Shastra, with Ahimsa to first creed. The party turned inactive. Swami Karpatri Ji was the person work for Vedanta that why he was make movement, sent many representatives teams, sentenced to jail many time, in many Religious Trips he do many general conference to tell that time Indian Government: Freedom of Worship bedrock for everyone. At last on 15th december 1957 on enforcement of police along with law head Magistrate, Station Officer or Harijan entered in the Garbh-Griha of old temple of Shri Kashi Vishwanth Ji breaked eternal principle and during protestation against Indian Government Swami Karpatri Ji sent to jail. In reply to this Swami Karpatri Ji spoke: For sacred tyranny Congress Party Governance is much more macabre than Aurangzeb Governance. On 5th Jan 1958, he decalred 'On celebration of Shivraatri we establish new Vishwanath Temple in Kashi' because No one born or nothing interupt or change our traditional Sanatan Vedic-worship ritual or Vedic Decree. Yes,If Government accepts the solemn ceremony with all appropriate ritual of Old Vishwanath Temple then we agree to lost our view or words. For new begin on 09th Feb 1958 or the 6th night of the new moon, in the dark fortnight(krishan paksha) during the month of Phalgun, in the Vikram Samvat 2014 Saadhaarana early morning at Mir Ghat, Benares lay foundation for New Vishwanath Temple. On 21st feb 1958 or the 3rd night of the old moon, in the moon-light fortnight(shukla paksha) during the month of Phagun, in the Vikram Samvat 2014 Saadhaarana with all vedic rituals and principles the ritual of consecration in which the consciousness or power of the deity is brought into the image awakens the icon in a temple.According to our vedic Sanatan Dharam priciple it is only after this rite is properly performed that worship should be offered to the murti. At present days also due to same vedic sanatan tenet, except duty Brahmin's no live human is allowed to the sanctum sanctorum. Karpatri Ji spoke very clear about if precentor very essential then we only follow Vedic Texts etc, Sanatan Vedic Testament for himself or mentor same to all. He also guided Alain Daniélou, a noted French indologist into converting into Hinduism under the name, Shiv Sharan. Swami Karpatriji was the most popular teacher of Advaita Vedanta in Varanasi in his lifetime. He was also the great expert of Sri Vidya or Dasha-mahavidyas and probably all the present day experts in Varanasi have somehow or the other obtained Sri Vidya from him or his pupils. There are some tales that he was a Siddha Purusha. His certain pupils include Swami Nischalananda Saraswati the present Shankaracharya of Puri as well as Swami Chinmayananda Saraswati the present Shankaracharya of Varanasi. With grace of Adishakti on the 14th night of the old moon, in the moon-light fortnight(shukla paksha) during the month of Magha, in the Vikram Samvat 2038 Bhaava or 07 Feb 1982 Atman leave the body or he get death. 15th night or Purnimanta of the old moon, in the moon-light fortnight(shukla paksha) during the month of Magha, in the Vikram Samvat 2038 Bhaava or 08 Feb 1982 as per Karpatri Ji last instruction Puripeethadeshwar Jagadguru Shankracharya Swami Sri Niranjandev Tirth Ji, Jyotishpeethadeshwar Jagadguru Shankracharya Swami Sri Swaroopanand Saraswati Ji reached Kashi Ji make arrangement for exequies after putting the corpse to town hall, benares for last public meet. At last Watery Grave or Burial done at Kedar Ghat, Varanasi. In presence of Two His Holiness above mentioned.

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Batuk Prasad Shastri, general secretary of Shri Kashi Vidwat Parishad

Personal Interests

Vedanta (/vɪˈdɑːntə/; Hindustani pronunciation: [ʋeːd̪aːn̪t̪], Devanagari: वेदान्त, Vedānta) or Uttarā Mīmāṃsā is one of the six orthodox schools of Hindu philosophy. The term literally translates to "the conclusion of Vedas," and originally referred to the Upanishads, a collection of foundational texts in Hinduism (considered the last appendix or final layer of the Vedic canon). By the 6th CE or AD or 62-63 Vikram Samvat , it came to mean all philosophical traditions concerned with interpreting the three basic texts of Hinduist philosophy, namely the Upanishads, the Brahma Sutras and the Bhagavad Gita, and was eventually recognized as distinct from the other five astika schools. Vedanta is the most prominent and philosophically advanced of the orthodox schools and the term Vedanta may also be used to refer to Indian philosophy more generally. There are at least ten schools of Vedanta, of which Advaita Vedanta, Vishishtadvaita, and Dvaita are the best known.
 Nārāyanam Padmabhuvam Vasishtam shaktiæ ca tatputraæ Parāsharam ca |
Vyāsam Shukam Gaudapāda Mahantam Govindam Yogindram athasya shishyam |
Shri Shankarāchārya mathasya Padmapādam ca hastamalakam ca shishyam |
Tam trotakam vartika karamanyan asmad guru-nsantat-amanato ’smi ||

"नारायणं पद्मभुवं वशिष्ठं शक्तिं च तत्पुत्रं पराशरं च व्यासं शुकं गौडपादं महान्तं गोविन्दयोगीन्द्रं अथास्य शिष्यम्
श्री शंकराचार्यं अथास्य पद्मपादं च हस्तामलकं च शिष्यम् तं तोटकं वार्त्तिककारमन्यान् अस्मद् गुरून् सन्ततमानतोऽस्मि अद्वैत गुरु परंपरा स्तोत्रम्"
Advaita Vedanta is a sub-school of the Vedanta school of Vedic or Hindu philosophy and religious practice, giving "a unifying interpretation of the whole body of Upanishads".The principal, though not the first, exponent of the Advaita Vedanta-interpretation was Shankara Bhagavadpada who systematised the works of preceding philosophers. Its teachings have influenced various sects of Hinduism. The key source texts for all schools of Vedānta are the Prasthanatrayi, the canonical texts consisting of the Upanishads, the Bhagavad Gita and the Brahma Sutras, of which they give a philosophical interpretation and elucidation. Advaita (not-two in Sanskrit) refers to the identity of the true Self, Atman, which is pure consciousness, and the highest Reality, Brahman, which is also pure consciousness. Followers seek liberation/release by acquiring vidyā (knowledge) of the identity of Atman and Brahman. Attaining this liberation takes a long preparation and training under the guidance of a guru. Advaita thought can also be found in non-orthodox Indian religious traditions, such as the tantric Nath tradition. Advaita Vedanta developed in a multi-faceted religious and philosophical landscape. The tradition developed in interaction with the other traditions of India, Buddhism, Vaishnavism and Shaivism, as well as the other schools of Vedanta. Gaudapada (c.6th century CE (also referred as Shri Gaudapadacharya) was the author or compiler of the Māṇḍukya Kārikā, a quintessential text which used madhyamika philosophical terms to delineate Advaita Vedanta philosophy. "Ajātivāda" is the fundamental philosophical doctrine of Gaudapada. According to Gaudapada, the Absolute is not subject to birth, change and death. The Absolute is aja, the unborn eternal. The empirical world of appearances is considered unreal, and not absolutely existent. Gaudapada's perspective is based on the Mandukya Upanishad. In the Mandukya Karika, Gaudapada's commentary on the Mandukya Upanishad, Gaudapada sets forth his perspective. According to Gaudapada, Brahman cannot undergo alteration, so the phenomenal world cannot arise from Brahman. If the world cannot arise, yet is an empirical fact, then the world has to be an unreal appearance of Brahman. And if the phenomenal world is an unreal appearance, then there is no real origination or destruction, only apparent origination or destruction. From the level of ultimate truth (paramārthatā) the phenomenal world is Maya. As stated in Gaudapada’s Karika Chapter II Verse 48: No jiva ever comes into existence. There exists no cause that can produce it. The supreme truth is that nothing ever is born. Brahma satyam jagan-mithya Jivo brahmaiva na parah “Brahman, the absolute, alone is real; this world is unreal (maya) and the jiva or the individual soul is not different from Brahman”. The most influential and dominant school of Indian philosophy, Advaita Vedanta, rejects theism and dualism by insisting that “Brahman [ultimate reality] is without parts or attributes…one without a second.” Since, Brahman has no properties, contains no internal diversity and is identical with the whole reality it cannot be understood as God. The relationship between Brahman and the creation is often thought to be panentheistic. Panentheism is also expressed in the Bhagavad Gita. In verse IX.4, Krishna states: By Me all this universe is pervaded through My unmanifested form. All beings abide in Me but I do not abide in them. Many schools of Hindu thought espouse monistic theism, which is thought to be similar to a panentheistic viewpoint. Chanting Har Har Har Har Har Har Har

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