गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

‎निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामा‬: | ‪द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्‬ || श्लोक भाषाय


मानमोह विगत भये, संग दोष जीत लिये, आत्मा में स्थित और कामना निवृत्त है | सुख-दुःख के द्वन्द्वों से मुक्त ऐसा ज्ञानीचित...

Posted by धर्मसम्राट स्वामी करपात्री on Saturday, 12 December 2015

“द्विपीठाभिषेकवादियों का भ्रम – भञ्जन “


काशी के घाट पर सारे देश के सामने एक तेली और एक म्लेच्छ वेदमंत्रों से तिलक आचमन पूर्वक अभिषेक प्राप्त किये

काशी के घाट पर सारे देश के सामने एक तेली और एक म्लेच्छ वेदमंत्रों से तिलक आचमन पूर्वक अभिषेक प्राप्त किये ....
...........कहाँ गयी श्री आद्य शंकराचार्य की परम्परा ??? कहाँ गया उनके आदेशों /उपदेशों का मान ???...
....काशी के पंडत कहिये या काशी के खंडित - एक ही बात है !
अब नहीं बोला कोई स्वघोषित ठेकेदार ....
....................बहती गंगा नहीं है अन्यथा हाथ धो लेते स्वार्थी !
तथाकथित भगवाधारी धर्मधूर्त जितना जोश स्वार्थपूर्ति में दिखाते हैं , उसका एक अंश भी आजत तक परमार्थ में दिखाए होते तो सनातन धर्म की आज ये दुर्दशा न हो रही होती !
|| जय श्रीराम ||

श्रीशिवरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य याज्ञवल्क्य ऋषि


श्री गणेशाय नमः .. अस्य श्रीशिवरक्शास्तोत्रमन्त्रस्य याज्ञवल्क्य ऋषि श्री सदाशिवो देवता .. अनुष्टुभ् छन्दः श्रीसदाशिवप्रीत्यर्थं शिवरक्शास्तोत्रजपे विनियोगः चरितं देवदेवस्य महादेवस्य पावनम . अपारं परमोदारं चतुर्वर्गस्य साधनम . गौरीविनायकोपेतं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रकम . शिवं ध्यात्वा दशभुजं शिवरक्शां पठेन्नरः गंगाधरः शिरः पातु भालं अर्धेन्दुशेखरः . नयने मदनध्वंसी कर्णो सर्पविभूश्हण . घ्राणं पातु पुरारातिः मुखं पातु जगत्पतिः . जिह्वां वागीश्वरः पातु कंधरां शितिकंधरः . श्रीकण्ठः पातु मे कण्ठं स्कन्धौ विश्वधुरन्धरः . भुजौ भूभारसंहर्ता करौ पातु पिनाकधृक . हृदयं शंकरः पातु जठरं गिरिजापतिः . नाभिं मृत्युञ्जयः पातु कटी व्याघ्राजिनाम्बरः . सक्थिनी पातु दीनार्तशरणागतवत्सलः उरू महेश्वरः पातु जानुनी जगदीश्वरः .. जङ्घे पातु जगत्कर्ता गुल्फौ पातु गणाधिपः चरणौ करुणासिंधुः सर्वाङ्गानि सदाशिवः एतां शिवबलोपेतां रक्शां यः सुकृती पठेत . स भुक्त्वा सकलान्कामान शिवसायुज्यमाप्नुयात . ग्रहभूतपिशाचाद्यास्त्रैलोक्ये विचरन्ति ये . दूरादाशु पलायन्ते शिवनामाभिरक्शणात . अभयङ्करनामेदं कवचं पार्वतीपतेः . भक्त्या बिभर्ति यः कण्ठे तस्य वश्यं जगत_त्रयम इमां नारायणः स्वप्ने शिवरक्शां यथा.अ.अदिशत . प्रातरुत_थाय योगीन्द्रो याज्ञवल्क्य: तथा अलिखत - इति श्रीयाज्ञवल्क्यप्रोक्तं शिवरक्शास्तोत्रं सम्पूर्णम -

शिखा (चोटी) धारण की आवश्यकता

हिन्दू-संस्कृति बहुत विलक्षण है । इसमेँ छोटी से छोटी अथवा बड़ी से बड़ी
प्रत्येक बात का धर्म के साध सम्बन्ध है और धर्म का सम्बन्ध कल्याणके साथ
है । हिन्दूधर्ममेँ जो-जो नियम बताये गये हैँ, वे सब-के-सब नियम मनुष्य
के कल्याण के साथ सम्बन्ध रखते हैँ । कोई परम्परासे सम्बन्ध रखते हैँ,
कोई साक्षात् सम्बन्ध रखते हैँ । हिन्दूधर्ममेँ विद्याध्ययनका भी सम्बन्ध
कल्याणके साथ है । संस्कृत व्याकरण भी एक दर्शनशास्त्र है, जिससे
परिणाममेँ परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है ! इसलिए हिन्दूधर्मके किसी
नियमका त्याग करना वास्तवमेँ अपने कल्याणका त्याग करना है !

जैसे, घड़ी मेँ छोटे-बड़े अनेक पुर्जे होते हैँ । उसमेँ बड़े पुर्जे का जो
महत्त्व है, वही महत्त्व छोटे पुर्जे का भी है । बड़ा पुर्जा अपनी जगह
पूरा है और छोटा पुर्जा अपनी जगह पूरा है । छोटे-से-छोटा पुर्जा भी यदि
निकाल दिया जाय तो घड़ी बन्द हो जायगी । इसी तरह हिन्दूधर्म की
छोटी-से-छोटी बात भी अपनी जगह पूरी है और कल्याण करने मेँ सहायक है ।
छोटी-सी शिखा अर्थात् चोटी भी अपनी जगह पूरी है और मनुष्य के कल्याणमेँ
सहायक है । शिखा का त्याग करना मानो अपने कल्याण का त्याग करना है
!...

* शिखा अर्थात चोटी हिन्दुओँ का प्रधान चिह्न है । हिन्दुओँ मेँ चोटी
रखने की परम्परा प्राचीनकाल से चली आ रही है । परंतु अब आपने इसका त्याग
कर दिया है- यह बड़े भारी नुकसान की बात है । विचार करेँ, चोटी न रखने के
लिए अथवा चोटी काटने के लिए किसी ने प्रचार भी नहीँ किया, किसी ने आपसे
कहा भी नहीँ, आपको आज्ञा भी नहीँ दी, फिर भी आपने चोटी काट ली तो आप मानो
कलियुगके अनुयायी बन गये ! यह कलियुग का प्रभाव है; क्योँकि उसे सबको
नरकोँ मेँ ले जाना है । चोटी कट जानेसे नरकोँ मेँ जाना सुगम हो जायगा ।
इसलिए आपसे प्रार्थना है कि चोटीको साधारण समझकर इसकी उपेक्षा न करेँ ।
चोटी रखना मामूली दीखता है, पर यह मामूली काम नहीँ है ।

अग्नि का नाम 'शिखी' है । शिखी उसको कहा जाता है, जिसकी शिखा हो-'शिखा
यस्यास्तीति स शिखी'। वह धूमशिखावाला अग्नि हमारा इष्टदेव
है-'अग्निर्देवो द्विजातीनम्'। अतः शिखा हमारे इष्टदेव (अग्नि) का प्रतीक
है ।...

* शिखा काटने से मनुष्य मरे हुए के समान हो जाता है और अपने धर्म से
भ्रष्ट हो जाता है । प्राचीनकाल मेँ किसी की शिखा काट देना मृत्युदण्ड के
समान माना जाता था । धर्म के साथ शिखा का अटूट सम्बन्ध है । इसलिए शिखा
काटने पर मनुष्य धर्मच्युत हो जाता है । बड़े दुःखकी बात है आज हिन्दूलोग
मुसलमानोँ-ईसाईयोँ के प्रभाव मेँ आकर अपने हाथोँ अपनी शिखा काट रहे हैँ !
खुद अपने धर्म का नाश कर रहे हैँ ! यह हमारी गुलामी की पहचान है । भगवान
ने गीतामेँ कहा है-
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ (गीता १६ । २३-२४)
'जो मनुष्य शास्त्रविधिको छोड़कर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न
सिद्धि (अन्तःकरणकी शुद्धि) को, न सुख (शान्ति) को और न परमगति को
प्राप्त होता है ।'
'अतः तेरे लिए कर्तव्य-अकर्तव्यकी व्यवस्थामेँ शास्त्र ही प्रमाण है-ऐसा
जानकर तू इस लोक मेँ शास्त्रविधिसे नियत कर्तव्य-कर्म करनेयोग्य है
अर्थात तुझे शास्त्रविधि के अनुसार कर्तव्यकर्म करने चाहिए ।'

चोटी रखना शास्त्र का विधान है । चाहे सुख मिले या दुःख मिले, हमेँ तो
शास्त्रके विधानके अनुसार चलना है । भगवान जो कहते हैँ, सन्त-महापुरुष जो
कहते हैँ, शास्त्र जो कहते हैँ, उसके अनुसार चलनेमेँ ही हमारा वास्तविक
हित है । भगवान और उनके भक्त -ये दोनोँ ही निःस्वार्थभावसे सबका हित
करनेवाले हैँ-
हेतु रहित जग जुग उपकारी।
तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥ (मानस, उत्तर॰ ४७ । ३)
इसलिए इनकी आज्ञा के अनुसार चलनेवाला लोक और परलोक दोनोँमेँ सुख पाता है
।...

* जिन्होँने अपनी उन्नति कर ली है, जिनका विवेक विकसित हो चुका है, जिनको
तत्त्व की प्राप्ति हो गयी है, ऐसे सन्त-महात्माओँकी बात मान लेनी चाहिए;
क्योँकि उनकी बुद्धिका नतीजा अच्छा हुआ है । उनकी बात माननेमेँ ही हमारा
लाभ है । अपनी बुद्धि से अबतक हमने कितनी उन्नति की है? क्या तत्त्वकी
प्राप्ति कर ली है? इसलिए भगवान, शास्त्र और संतोँकी बात मानकर शिखा धारण
कर लेनी चाहिए । अगर उनकी बात समझमेँ न आये तो भी मान लेनी चाहिए । हमने
आजतक अपनी समझसे काम किया तो कितना लाभ लिया? जैसे, किसी ने व्यापार मेँ
बहुत धन कमाया हो तो वह जैसा कहे, वैसा ही हम करेँगे तो हमेँ भी लाभ होगा
। उनको लाभ हुआ है तो हमेँ लाभ क्योँ नहीँ होगा? ऐसे ही जिन
सन्त-महात्माओँने परमात्मप्राप्ति कर ली है; अशान्ति, दुःख, सन्ताप आदिको
मिटा दिया, उनकी बात मानेँगे तो हमारे को भी अवश्य लाभ होगा ।

मैँ चोटी रखनेकी बात कहता हूँ तो आपके अहित के लिए नहीँ कहता हूँ । आपको
दुःख हो जाय, नुकसान हो जाय, संताप हो जाय-ऐसा मेरा बिल्कुल उद्देश्य
नहीँ है । मैँ आपके हित की बात कहता हूँ । आपके लोक और परलोक दोनोँ सुधर
जायँ, ऐसी बात कहता हूँ । वही बात कहता हूँ जो पीढ़ियोँसे आपकी
वंश-परम्परा मेँ चली आयी है । एक चोटी रखनेसे आपका क्या नुकसान होता है?
आपको क्या दोष लगता है? क्या पाप लगता है? आपके जीवन मेँ क्या अड़चन आती
है? चोटी रखनेकी जो परंपरा सदा से थी, उसका त्याग आपने किसके कहने से कर
दिया? किस सन्तके कहने से, किस पुराणके कहने से, किस शास्त्रकी आज्ञा से,
किस वेदकी आज्ञासे आपने चोटी रखन छोड़ दिया?

चोटी रखना बहुत सुगम काम है, पर आपके लिए कठिन हो रहा है; क्योँकि आपने
उसको छोड़ दिया है । यह बात आपकी पीढ़ियोँ से है । आपके बाप, दादा, परदादा
आदि सब परम्परा से चोटी रखते आये हैँ, पर अब आपने इसका त्याग कर दिया,
इसलिए अब आपको चोटी रखनेमेँ कठिनता हो रही है । विचार करेँ, चोटी रखना
छोड़ देनेसे आपको क्या लाभ हुआ? और अब आप चोटी रख लेँ तो क्या नुकसान
होगा? चोटी रखने से आपको पैसोँकी हानि होती हो, धर्मकी हानि होती हो,
स्वास्थ्यकी हानी होती हो, आपको बड़ा भारी दुःख मिलता हो तो बतायेँ ! चोटी
न रखने से लाभ तो कोई-सा भी नहीँ है, पर हानि बड़ी भारी है ! चोटी के बिना
आपका देवपूजन तथा श्राद्ध-तर्पण निष्फल हो जाता है, आपके दान-पुण्य आदि
सब शुभकर्म निष्फल हो जाते हैँ । इसलिए चोटी को मामुली समझकर इसकी उपेक्षा न करेँ ।


पहले सभी द्विज लोग चोटी रखते थे । पर हमारे देखते-देखते थोड़े वर्षोँमेँ आदमी शिखारहित हो गये ।
अब प्रायः लोगोँ की शिखा नहीँ दीखती । शिखा और सूत्र (जनेऊ) का परस्पर घनिष्ठ
सम्बन्ध है । आश्चर्य की बात है कि आज ऐसे लोग भी हैँ; जिनका सूत्र तो
है, पर शिखा नहीँ है ! यह कितने पतन की बात है ! अगर यही दशा रही तो आगे
आपको कौन कहेगा कि चोटी रखो? और क्योँ कहेगा? कहनेसे उसको क्या लाभ?

शिखा  पहचान है । यह आपकी की रक्षा करनेवाली है ।
प्रश्न - क्या शूद्र को शिखा रखनी चाहिए ?
उत्तर - शूद्र को शिखा रखने का अधिकार नहीं ।।
अपने वर्णाश्रम धर्म रूपी तप के द्वारा श्री हरि की आराधना से अधिक श्री हरि को संतुष्ट करने का अन्य कोई उपाय नहीं है ।।
{ स्व-वर्णाश्रम धर्मेण तपसा हरितोषणात्। हरिराराध्यते पुंसां नान्यत्तत्तोषकारणम्।। }
अपने वर्णाश्रम धर्म का पालन करने से मनुष्य में स्वतः वैराग्यादि साधन -चतुष्टय का प्राकट्य हो जाता है ।।
{ स्ववर्णाश्रमधर्मेण तपसा हरितोषणात् । साधनं प्रभवेत्पुंसां वैराग्यादि चतुष्टयम् ।। }

जनेऊ और शिखा सबके लिए नहीँ है, केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए है,
जैसे मुसलमानोँ के लिए सुन्नत है, ऐसे ही हिन्दुओँ द्विज वर्ण के लिए के लिए शिखा है ।
सुन्नत के बिना कोई मुसलमान नहीँ मिलेगा, पर शिखा के बिना आज
हिन्दुओँका समुदाय-का-समुदाय मिल जायगा । मुसलमान और ईसाई बड़े जोरोँ से
अपने धर्म का प्रचार कर रहे हैँ और हिन्दुओँ का धर्म-परिवर्तन करनेकी नयी-नयी योजनाएँ बना रहे हैँ ।
आपने अपनी चोटी कटवाकर उनके प्रचार-कार्य को सुगम बना दिया है !
 इसलिए समय रहते हिन्दुओँ को सावधान हो जाना चाहिए।
 मुसलमान अपने धर्म का प्रचार मूर्खता से करते हैँ और ईसाई बुद्धिमत्ता से ।
मुसलमान तो तलवार के जोरसे जबर्दस्ती धर्मपरिवर्तन करते हैँ, पर
ईसाई बाहर से सेवा करके भीतर-ही-भीतर (गुप्त रीतिसे) धर्म-परिवर्तन करते हैँ ।

वे स्कूल खोलते हैँ और बालकोँ पर अपने धर्मके संस्कार डालते हैँ ।
इसीका परिणाम है कि घर बैठे-बैठे हिन्दुओँने अपनी चोटीका त्याग कर दिया ।
इस काममेँ ईसाई सफल हो गये ! मुसलमानोँ और ईसाइयोँका उद्देश्य
मनुष्यमात्र का कल्याण करना नहीँ है, प्रत्युत अपनी संख्या बढ़ाना है, जिससे
उनका राज्य हो जाय । कलियुगका प्रभाव प्रतिवर्ष, प्रतिमास, प्रतिदिन
जोरोँसे बढ़ रहा है । लोगोँकी बुद्धि भ्रष्ट हो रही है । मनुष्यमात्र का
कल्याण चाहनेवाली हिन्दू-संस्कृति नष्ट हो रही है । हिन्दू स्वयं ही अपनी
संस्कृति का नाश करेँगे तो रक्षा कौन करेगा?...

प्रश्न- चोटी रखने से शर्म आती है, वह कैसे छुटे?

उत्तर- आश्चर्यकी बात है कि व्यापार आदिमेँ बेईमानी, झूठ-कपट करनेमेँ
शर्म नही, गर्भपात आदि पाप करनेमेँ शर्म नहीँ आती, चोरी, विश्वासघात आदि
करते समय शर्म नहीँ आती, पर चोटी रखनेमेँ शर्म आती है ! आपकी शर्म ठीक है
या भगवान और संतो की बात मानना, उनको प्रसन्न करना ठीक है? आप चोटी रखो
तो आरम्भमेँ शर्म आयेगी, पर पीछे सब ठीक हो जायेगा ।...

लोग हँसी उड़ायेँ, पागल कहेँ तो उसको सह लो, पर धर्मका त्याग मत करो ।
आपका धर्म आपके साथ चलेगा, हँसी-दिल्लगी आपके साथ नहीँ चलेगी । लोगोँकी
हँसी से आप डरो मत । लोग पहले हँसी उड़ायेँगे, पर बादमेँ आदर करने लगेँगे
कि यह अपने धर्म का पक्का आदमी है ।...

अतः उनकी हँसी की परवाह न करके अपने धर्मका पालन करना चाहिए ।

न जातु कामान्न भयान्न लोभाद् धर्मँ त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः ।
नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः॥
(महाभारत, स्वर्गा॰ ५।६३)

'कामनासे, भयसे, लोभसे अथवा प्राण बचाने के लिये भी धर्मका त्याग न करे ।
धर्म नित्य है और सुख-दु:ख अनित्य हैँ । इसी प्रकार जीवात्मा नित्य है और
उसके बन्धनका हेतु (राग) अनित्य है ।'

|| जय श्री राम ||

भविष्य पुराण के जिस भाग में मुहम्मदके वर्णन है ,वह मूल संस्कृत और उसके हिंदी अनुवाद केसाथ दिया जा रहा है |

आज हिन्दुओं का भविष्य पुराण हमारी दृष्टि में कहीं भी मूल रूप में हिन्दी अनुवाद सहित नहीं छापा जा रहा , इसके प्रचार की बहुत आवश्यकता है , तभी हिन्दू का भविष्य सुरक्षित होगा ! गीताप्रेस ने भी काट छांट कर भविष्य पुराण का संक्षेप बनाया , और मूल प्रसंगों को छोड़ गयी ! चलो उसका उतना ही बहुत किन्तु हमें आज अपने मूल हिन्दू धर्म को समझाने की नितान्त आवश्यकता है ! और उसे यथायोग्य प्रचार करने का कार्य करना चाहिए !

हम यहां एक बन्धु का लेख प्रस्तुत कर रहे हैं , आप इसके सापेक्ष समीक्षित विचार करें -

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भविष्य पुराण के जिस भाग में मुहम्मदके वर्णन है ,वह मूल संस्कृत और उसके हिंदी अनुवाद केसाथ दिया जा रहा है . ताकि लोगों का भ्रम दूर हो जाए

भविष्य पुराण में महामद ( मुहम्मद ) एक पैशाच धर्म स्थापक -भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व, खण्ड 3, अध्याय 3 श्लोक . 1 -31

श्री सूत जी ने कहा - राजा शालिवाहन के वंश में दस राज हुए थे। उन सबने पञ्च सौ वर्ष पर्यन्त राज्य शासन किया था और अंत में दुसरे लोक में चले गए थे।
श्री सूत उवाच-
शालिवाहन वंशे च राजानो दश चाभवन्। राज्यं पञ्चशताब्दं च कृत्वा लोकान्तरं ययुः

२. उस समय में इस भूमण्डल में क्रम से मर्यादा लीन हो गयी थी। जो इनमे दशम राजा हुआ है वह भोजराज नाम से प्रसिद्द हुआ। .

मर्य्यादा क्रमतो लीना जाता भूमण्डले तदा। भूपतिर्दशमो यो वै भोजराज इति स्मृतः।

३. उसने मर्यादा क्षीण होते देखकर परम बलवान उसने(राजा ने) दिग्विजय करने को गमन किया था। सेना में दस सहस्त्र सैनिक के साथ कविश्रेष्ठ कालिदास थे।

दृष्ट्वा प्रक्षीणमर्य्यादां बली दिग्विजयं ययौ। सेनया दशसाहस्र्या कालिदासेन संयुतः।

४. तथा अन्य ब्राह्मणों के सहित वह सिन्धु नदी के पार प्राप्त हुआ(अर्थात पार किया) था। और उसने गान्धारराज, मलेच्छ, काश्मीर, नारव और शठों को दिग्विजय में जीता।

तथान्यैर्ब्राह्मणैः सार्द्धं सिन्धुपारमुपाययौ जित्वा गान्धारजान् म्लेच्छान् काश्मीरान् आरवान् शठान्।

५. उनका बहुत सा कोष प्राप्त करके उन सबको योग्य दण्ड दिया था। इसी समय काल में मल्लेछों का एक आचार्य हुआ।

तेषां प्राप्य महाकोषं दण्डयोग्यानकारयत् एतस्मिन्नन्तरे म्लेच्छ आचार्येण समन्वितः।

६ महामद शिष्यों की अपने शाखाओं में बहुत प्रसिद्द था। नृप(राजा) ने मरुस्थल में निवास करने वाले महादेव को नमन किया।

महामद इति ख्यातः शिष्यशाखा समन्वितः नृपश्चैव महादेवं मरुस्थलनिवासिनम्।

७. पञ्चजगव्य से युक्त गंगा के जल से स्नान कराके तथा चन्दन आदि से अभ्याचना(भक्तिपूर्वकभाव से याचना) करके हर(महादेव) को स्तुति किया।

गंगाजलैश्च सस्नाप्य पञ्चगव्य समन्वितैः। चन्दनादिभिरभ्यर्च्य तुष्टाव मनसा हरम् ।

भोजराज ने कहा - हे गिरिजा नाथ ! मरुस्थल में निवास करने वाले, बहुत सी माया में प्रवत होने त्रिपुरासुर नाशक वाले हैं।

भोजराज उवाच-
8. नमस्ते गिरिजानाथ मरुस्थलनिवासिने। त्रिपुरासुरनाशाय बहुमायाप्रवर्त्तिने।

९ मलेच्छों से गुप्त, शुद्ध और सच्चिदानन्द रूपी, मैं आपकी विधिपूर्वक शरण में आकर प्रार्थना करता हूँ।

म्लेच्छैर्गुप्ताय शुद्धाय सच्चिदानन्दरूपिणे। त्वं मां हि किंकरं विद्धि शरणार्थमुपागतम् ।
.

१०. सूत जी ने कहा - महादेव ने प्रकार स्तुति सुन राजा से ये शब्द कहे "हे भोजराज आपको महाकालेश्वर तीर्थ जाना चाहिए।"
सूत उवाच-
इति श्रुत्वा स्तवं देवः शब्दमाह नृपाय तम्। गन्तव्यं भोजराजेन महाकालेश्वरस्थले ।

११. यह वाह्हीक भूमि मलेच्छों द्वारा दूषित हो चुकी है। इस दारुण(हिंसक) प्रदेश में आर्य(श्रेष्ठ)-धर्म नहीं है।

म्लेच्छैस्सुदूषिता भूमिर्वाहीका नाम विश्रुता। आर्य्यधर्मो हि नैवात्र वाहीके देशदारुणे ।

१२. जिस महामायावी राक्षस को मैंने पहले माया नगरी में भेज दिया था(अर्थात नष्ट किया था) वह त्रिपुर दैत्य कलि के आदेश पर फिर से यहाँ आ गया है।

बभूवात्र महामायी योऽसौ दग्धो मया पुरा। त्रिपुरो बलिदैत्येन प्रेषितः पुनरागतः ।

१३. वह मुझसे वरदान प्राप्त अयोनिज(pestle, मूसल, मूलहीन) हैं। एवं दैत्य समाज की वृद्धि कर रहा है। महामद के नाम से प्रसिद्द और पैशाचिक कार्यों के लिए तत्पर है।

अयोनिः स वरो मत्तः प्राप्तवान् दैत्यवर्द्धनः। महामद इति ख्यातः पैशाच कृति तत्परः ।

१४. हे भूप(भोजराज) ! आपको मानवता रहित धूर्त देश में नहीं जाना चाहिए। मेरी प्रसाद(कृपा) से तुम विशुद्ध राजा हो।

नागन्तव्यं त्वया भूप पैशाचे देशधूर्तके। मत् प्रसादेन भूपाल तव शुद्धिः प्रजायते ।

१५. यह सुनने पर राजा ने स्वदेश को वापस प्रस्थान किया। और महामद उनके पीछे सिन्धु नदी के तीर(तट) पर आ गया।

इति श्रुत्वा नृपश्चैव स्वदेशान् पुनरागमत्। महामदश्च तैः सार्द्धं सिन्धुतीरमुपाययौ ।

क्रमशः ----------------->

16. उवाच भूपतिं प्रेम्णा मायामदविशारदः। तव देवो महाराज मम दासत्वमागतः ।
१६. मायामद माया के ज्ञाता(महामद) ने राजा से झूठ कहा - हे महाराज ! आपके देव ने मेरा दासत्व स्वीकार किया है अतः वे मेरे दास हो गए हैं।

17. ममोच्छिष्टं संभुजीयाद्याथात त्पश्य भो नृप। इति श्रुत्वा तथा परं विस्मयमागतः ।
१७. हे नृप(भोजराज) ! इसलिए आज सेआप मुझे ईश्वर के संभुज(बराबर) उच्छिष्ट(पूज्य) मानिए, ये सुन कर राजा विस्मय को प्राप्त भ्रमित हुआ।

18. म्लेच्छधर्मे मतिश्चासीत्तस्य भूपस्य दारुणे, तच्छृत्वा कालिदासस्तु रुषा प्राह महामदम्।
१८. राजा की दारुण(अहिंसा) मलेच्छ धर्म में रूचि में वृद्धि हुई। यह राजा के श्रवण करते देख, कालिदास ने क्रोध में भरकर महामद से कहा।

19. माया ते निर्मिता धूर्त नृपम्हन हेतवे हनिष्यामि दुराचारं वाहीकं पुरुषाधमम्।
१९. हे धूर्त ! तूने नृप(राजधर्म) से मोह न करने हेतु माया रची है। दुष्ट आचार वाले पुरुषों में अधम वाहीक को मैं तेरा नाश कर दूंगा।

20. इत्युक्त्वा स द्विजः श्रीमान् नवार्ण जप तत्परः जप्त्वा दशसहस्रं च तद्दशांशं जुहाव सः।
२०. यह कह श्रीमान ब्राह्मण(कालिदास) ने नर्वाण मंत्र में तत्परता की। नर्वाण मंत्र का दश सहस्त्र जाप किया और उसके दशाश जप किया।

21. भस्म भूत्वा स मायावी म्लेच्छदेवत्वमागतः, भयभीतस्तु तच्छिष्या देशं वाहीकमाययुः।
२१. वह मायावी भस्म होकर मलेच्छ देवत्व अर्थात मृत्यु को प्राप्त हुआ। भयभीत होकर उसके शिष्य वाहीक देश में आ गए।

22. गृहीत्वा स्वगुरोर्भस्म मदहीनत्वमागतम्, स्थापितं तैश्च भूमध्ये तत्रोषुर्मदतत्पराः।
२२. उन्होंने अपने गुरु(महामद) की भस्म को ग्रहण कर लिया और और वे मदहीन को गए। भूमध्य में उस भस्म को स्थापित कर दिया। और वे वहां पर ही बस गए।

23. मदहीनं पुरं जातं तेषां तीर्थं समं स्मृतम्, रात्रौ स देवरूपश्च बहुमायाविशारदः।
२३. वह मदहीन पुर हो गया और उनके तीर्थ के सामान माना जाने लगा। उस बहुमाया के विद्वान(महामद) ने रात्रि में देवरूप धारण किया।

24. पैशाचं देहमास्थाय भोजराजं हि सोऽब्रवीत् आर्य्यधर्म्मो हि ते राजन् सर्ब धर्मोतमः स्मृतः ।
२४. आत्मा रूप में पैशाच देह को धारण कर भोजराज आकर से कहा। हे राजन(भोजराज) !मेरा यह आर्य समस्त धर्मों में अतिउत्तम है।

25. ईशाज्ञया करिष्यामि पैशाचं धर्मदारुणम् लिंगच्छेदी शिखाहीनः श्मश्रुधारी स दूषकः।
२५. अपने ईश की आज्ञा से पैशाच दारुण धर्म मैं करूँगा। मेरे लोग लिंगछेदी(खतना किये हुए), शिखा(चोटी) रहित, दाढ़ी रखने वाले दूषक होंगे।

26. उच्चालापी सर्वभक्षी भविष्यति जनो मम विना कौलं च पशवस्तेषां भक्ष्या मता मम।
२६. ऊंचे स्वर में अलापने वाले और सर्वभक्षी होंगे। हलाल(ईश्वर का नाम लेकर) किये बिना सभी पशु उनके खाने योग्य न होगा।

27. मुसलेनैव संस्कारः कुशैरिव भविष्यति तस्मात् मुसलवन्तो हि आतयो धर्मदूषकाः।
२७. मूसल से उनका संस्कार किया जायेगा। और मूसलवान हो इन धर्म दूषकों की कई जातियां होंगी।

28. इति पैशाच धर्म श्च भविष्यति मयाकृतः इत्युक्त्वा प्रययौ देवः स राजा गेहमाययौ।
२८. इस प्रकार भविष्य में मेरे(मायावी महामद) द्वारा किया हुआ यह पैशाच धर्म होगा। यह कहकर वह वह (महामद) चला गया और राजा अपने स्थान पर वापस आ गया।

29. त्रिवर्णे स्थापिता वाणी सांस्कृती स्वर्गदायिनी,शूद्रेषु प्राकृती भाषा स्थापिता तेन धीमता।
२९. उसने तीनों वर्णों में स्वर्ग प्रदान करने वाली सांस्कृतिक भाषा को स्थापित किया और विस्तार किया। शुद्र वर्ण हेतु वहां प्राकृत भाषा के का ज्ञान स्थापित/विस्तार किया(ताकि शिक्षा और कौशल का आदान प्रदान आसान हो)।

30. पञ्चाशब्दकालं तु राज्यं कृत्वा दिवं गतः, स्थापिता तेन मर्यादा सर्वदेवोपमानिनी।
३०. राजा ने पचास वर्ष काल पर्यंत राज(शासन) करते हुए दिव्य गति(परलोक) को प्राप्त हुआ। तब सभी देवों की मानी जाने वाली मर्यादा स्थापित हुई।

31. आर्य्यावर्तः पुण्यभूमिर्मध्यंविन्ध्यहिमालयोः आर्य्य वर्णाः स्थितास्तत्र विन्ध्यान्ते वर्णसंकराः।
३१. विन्ध्य और हिमाचल के मध्य में आर्यावर्त परम पुण्य भूमि है अर्थात सबसे उत्तम(पवित्र) भूमि है, आर्य(श्रेष्ठ) वर्ण यहाँ स्थित हुए। और विन्ध्य के अंत में अन्य कई वर्ण मिश्रित हुए।

भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व, खण्ड 3, अध्याय 3 श्लोक . 1 -31 _____________________________________________
|| जयश्रीराम ||

सोमवार, 7 दिसंबर 2015

मठाम्नाय महानुशासनम्

“मठाम्नाय महानुशासनम् ” [मठाम्नाय (मठ+आम्नाय) / महानुशासन (महा+अनुशासन)] भगवान् श्रीमदाद्यशंकराचार्य द्वारा विरचित वह शास्त्रविशेष है, जो पूज्य जगद्गुरु महाराज द्वारा प्रवर्धित चतुष्पीठात्मिका व्यवस्था से सम्बन्धित विधानों एवं सिद्धान्तों के प्रकाशन को समर्पित है | इसे ही “मठाम्नाय महासेतुः” भी कहा जाता है |यह शास्त्र ‘मठाम्नायोपनिषद् ‘ (अर्थात् मठाम्नाय ) से सम्बन्धित महानुशासनम् या महासेतु है | प्रायः इसके प्रामाणिक श्लोकों को लेकर मनीषियों में पृथक्-पृथक् मत देखने को मिलता है, जिस कारण सामान्य जिज्ञासुओं के लिए मौलिक स्थिति अस्पष्ट सी हो गयी है | हमने इस अनुशासन के वर्त्तमान उपलब्ध स्वरूप को यथातथ्य रूप से दर्शाने का प्रयास किया है | _____________________________________________________ [१] आचार्य श्री बलदेव उपाध्याय (अध्यक्ष, पुराणेतिहास विभाग, वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय ) विरचित शोधपूर्ण ग्रन्थ ‘श्री शंकराचार्य’ आधारित ‘मठाम्नाय महानुशासनम्’, जो इस ग्रन्थ के पृष्ठ संख्या २१४-२१६ में उद्धृत है, यहाँ लेखक ने स्पष्ट किया है कि अनेक हस्तलिखित प्रतियों को मिलाकर यह उसके असली मूलरूप को खोजा गया है | इसे आप सभी के सम्मुख उपस्थित किया जा रहा है | ध्यातव्य है कि इस प्रसिद्ध ग्रन्थ का प्रथम संस्करण १९५० में , द्वितीय १९६३ तथा तृतीय २००३ में हिन्दुस्तानी एकेडमी , इलाहाबाद से हुआ है | – महानुशासनाम् आम्नायाः कथिता ह्येते यतीनाञ्च पृथक्-पृथक् । तैः सर्वेश्चतुराचार्यैर्नियोगेन यथाक्रमम् ॥१॥ प्रयोक्ततव्याः स्वधर्मेषु शासनीयास्ततोऽन्यथा । कुर्वन्तु एव सततमटनं धरणीतले ॥२॥ विरुद्धाचरणप्राप्तावाचार्याणां समाज्ञया । लोकान् संशीलयन्त्वेव स्वधर्माप्रतिरोधतः ॥३॥ स्व-स्वराष्ट्रप्रतिष्ठित्यै सञ्चारः सुविधीयताम् । मठे तु नियतो वास आचार्यस्य न युज्यते ॥४॥ वर्णाश्रमसदाचारा अस्माभिर्ये प्रसाधिताः । रक्षणीयाः सदैवैते स्व-स्व भागे यथाविधि ॥५॥ यतो विनष्टिर्महती धर्मस्यास्य प्रजायते । मान्द्यं सन्त्याज्यमेवात्र दाक्ष्यमेव समाश्रयेत् ॥६॥ परस्परविभागे तु न प्रवेशः कदाचन । परस्परेण कर्तव्या ह्याचार्येण व्यवस्थितिः ॥७॥ मर्यादाया विनाशेन लुप्येरन्नियमाः शुभाः । कलहाङ्गारसम्पत्तिरतस्तां परिवर्जयेत् ॥८॥ परिव्राडार्यमर्यादो मामकीनां यथाविधि । चतुष्पीठाधिगां सत्तां प्रयुञ्ज्याच्च पृथक्-पृथक् ॥९॥ शुचिर्जितेन्द्रियो वेद-वेदाङ्गादिविशारदः । योगज्ञः सर्वशास्त्राणां स मदास्थानमापुयात् ॥१०॥ उक्तलक्षणसम्पन्नः स्याच्चेन्मत्पीठभाग् भवेत् । अन्यथारूढपीठोऽपि निग्रहार्हो मनीषिणाम् ॥११॥ न जातु मठमुच्छिन्द्यादिधिकारिण्युपस्थिते । विघ्नानामपि बाहुल्यादेष धर्मः सनातनः ॥१२॥ अस्मत्पीठसमारूढः परिव्राडुक्तलक्षणः । अहमेवेति विज्ञेयो यस्य देव इति श्रुतेः ॥१३॥ एक एवाविषेच्यः स्यादन्ते लक्षणसम्मतः । तत्तत्पीठे क्रमेणैव न बहु युज्यते क्वचित् ॥१४॥ सुधन्वनः समौत्सुक्यनिवृत्यै धर्म-हेतवे । देवराजोपचारांश्च यथावदनुपालयेत् ॥१५॥ केवलं धर्ममुद्दिश्य विभवो ब्रह्मचेतसाम् । विहितश्चोपकाराय पद्मपत्रनयं व्रजेत् ॥१६॥ सुधन्वा हि महाराजस्तथान्ये च नरेश्वराः । धर्मपारम्परीमेतां पालयन्तु निरन्तरम् ॥१७॥ चातुर्वर्ण्यं यथायोग्यं वाङ्मनः कायकर्मभिः । गुरोः पीठं समर्चेत विभागानुक्रमेण वै ॥१८॥ धरामालम्ब्य राजानः प्रजाभ्यः करभागिनः । कृताधिकारा आचार्या धर्मतस्तद्वदेव हि ॥१९॥ धर्मो मूलं मनुष्याणां स चाचार्यावलम्बनः । तस्मादाचार्यसुमणेः शासनं सर्वतोऽधिकम् ॥२०॥ तस्मात् सर्वप्रयत्नेन शासनं सर्वसम्मतम् । आचार्यस्य विशेषेण ह्यौदार्यभरभागिनः ॥२१॥ आचार्याक्षिप्त दण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥२२॥ इत्येवं मनुरप्याह गौतमोऽपि विशेषतः । विशिष्टशिष्टाचारोऽपि मूलादेव प्रसिद्ध्यति ॥२३॥ तानाचार्योपदेशांश्च राजदण्डांश्च पालयेत् । तस्मादाचार्यराजानावनवद्यौ न निन्दयेत् ॥२४॥ धर्मस्य पद्धतिर्ह्येषा जगतः स्थितिहेत्वे । सर्ववर्णाश्रमाणां हि यथाशास्त्रं विधीयते ॥२५॥ कृते विश्वगुरुर्ब्रह्मा त्रेतायामृषीसत्तमः । द्वापरे व्यास एव स्यात् कलावत्र भवाम्यहम् ॥२६॥ ॥ इति महानुशासनम् ॥ ______________________________________________ ______________________________________________ [२] ‘मठाम्नाय महानुशासनम् के अद्यावधिपर्यन्त उपलब्ध समस्त श्लोक – ॥ मठाम्नायमहानुशासनम् ॥ प्रथमः पश्चिमाम्नायः शारदामठ उच्यते । कीटवारः सम्प्रदायस्तस्य तीर्थाश्रमौ पदे ॥ १॥ द्वारकाख्यं हि क्षेत्रं स्याद् देवः सिद्धेश्वरः स्मृतः । भद्रकाली तु देवी स्याद् हस्तामलक देशिकः ॥ २॥ आचार्यो विश्वरूपकः गोमतीतीर्थममलं ब्रह्मचारी स्वरूपकः । सामवेदस्य वक्ता च तत्र धर्मं समाचरेत् ॥ ३॥ जीवात्मपरमात्मैक्य बोधो यत्र भविष्यति । तत्वमसि महावाक्यं गोत्रोऽविगत उच्यते ॥ ४॥ सिन्धु-सौवीर-सौराष्ट्र-महाराष्ट्रस्तथान्तराः । देशाः पश्चिमदिक्स्था ये शारदामठभागिनः ॥ ५॥ त्रिवेणीसङ्गमे तीर्थे तत्त्वमस्यादिलक्षणे । स्नायात्तत्त्वार्थभावेन तीर्थनाम्ना स उच्यते ॥ ६॥ आश्रमग्रहणे प्रौढ आशापाशविवर्जितः । यातायातविनिर्मुक्त एतदाश्रमलक्षणम् ॥ ७॥ कीटादयो विशेषेण वार्यन्ते यत्र जन्तवः । भूतानुकम्पया नित्यं कीटवारः स उच्यते ॥ ८॥ स्व-स्वरूपं विजानाति स्वधर्म-परिपालकः । स्वानन्दे क्रीडते नित्यं स्वरूपो बटुरुच्यते ॥ ९॥ पूर्वाम्नायो द्वितीयः स्याद् गोवर्धनमठः स्मृतः । भोगवारः सम्प्रदायो वनारण्ये पदे स्मृते ॥ १०॥ पुरुषोत्तमं तु क्षेत्रं स्याञ्ज्जगन्नाथोऽस्य देवता । विमलाख्याहि देवी स्यादाचार्यः पद्मपादकः ॥ ११॥ तीर्थं महोदधिः प्रोक्तं ब्रह्मचारी प्रकाशकः । महावाक्यं च तत्र स्यात् प्रज्ञानं ब्रह्म चोच्यते ॥ १२॥ ऋग्वेदपठनं चैव काश्यपो गोत्रमुच्यते । अङ्गबङ्गकलिङ्गाश्च मगधोत्कलबर्बराः । गोवर्धनमठाधीना देशाः प्राचीव्यवस्थिताः ॥ १३॥ सुरम्ये निर्जने स्थाने वने वासं करोति यः । आशाबन्धविनर्मुक्तो वननामा स उच्यते ॥ १४॥ अरण्ये संस्थितो नित्यमानन्दे नन्दने वने । त्यक्त्वा सर्वमिदं विश्वमारण्यं परिकीर्त्यते ॥ १५॥ भोगो विषय इत्युक्तो वार्यते येन जीविनाम् । सम्प्रदायो यतीनाञ्च भोगवारः स उच्यते ॥ १६॥ स्वयं ज्योतिर्विजानाति योगयुक्तिविशारदः । तत्त्वज्ञानप्रकाशेन तेन प्रोक्तः प्रकाशकः ॥ १७॥ तृतीयस्तूत्तराम्नायो ज्योतिर्नाम मठो भवेत् । श्रीमठश्चेति वा तस्य नामान्तरमुदीरितम् ॥ १८॥ आनन्दवारो विज्ञेयः सम्प्रदायोऽस्य सिद्धिदः । पदानि तस्य ख्यातानि गिरिपर्वतसागराः ॥ १९॥ बदरीकाश्रमः क्षेत्रं देवो नारायणः स्मृतः । पूर्णागिरि च देवी स्यादाचार्यस्तोटकः स्मृतः ॥ २०॥ तीर्थं चालकनन्दाख्यं आनन्दो ब्रह्मचार्यभूत् । अयमात्मा ब्रह्म चेति महावाक्यमुदाहृतम् ॥ २१॥ अथर्ववेदवक्ता च भृग्वाख्यं गोत्रमुच्यते । कुरुकाश्मीरकाम्बोजपाञ्चालादिविभागतः । ज्योतिर्मठवशा देशा उदीचीदिगवस्थिताः ॥ २२॥ वासो गिरिवने नित्यं गीताध्ययनतत्परः । गम्भीराचलबुद्धिश्च गिरिनामा स उच्यते ॥ २३॥ वसन् पर्वतमूलेषु प्रौढं ज्ञानं विभर्ति यः । सारासारं विजानाति पर्वतः परिकीर्त्यते ॥ २४॥ तत्वसागरगम्भीर ज्ञानरत्नपरिग्रहः । मर्यादां वै न लङ्घ्येत सागरः परिकीर्त्यते ॥ २५॥ आनन्दो हि विलासश्च वार्यते येन जीविनाम् । सम्प्रदायो यतीनां चानन्दवारः स उच्यते ॥ २६॥ सत्यं ज्ञानमनन्तं यो नित्यं ध्यायेत तत्त्ववित् । स्वानन्दे रमते चैव आनन्दः परिकीर्त्यते ॥ २७॥ चतुर्थो दक्षिणाम्नायः श्रृङ्गेरी तु मठो भवेत् । सम्प्रदायो भूरिवारो भूर्भवो गोत्रमुच्यते ॥ २८॥ पदानि त्रीणि ख्यातानि सरस्वती भारती पुरी । रामेश्वराह्वयं क्षेत्रमादिवाराहदेवता ॥ २९॥ कामाक्षी तस्य देवी स्यात् सर्वकामफलप्रदा । सुरेश्वराख्य आचार्यस्तुङ्गभद्रेति तीर्थकम् ॥ ३०॥ हस्तामलक चैतन्याख्यो ब्रह्मचारी यजुर्वेदस्य पाठकः । अहं ब्रह्मास्मि तत्रैव महावाक्यं समीरितम् ॥ ३१॥ आन्ध्रद्रविडकर्णाटकेरलादिप्रभेदतः । श्रृङ्गेर्यधीना देशास्ते ह्यवाचीदिगवस्थिताः ॥ ३२॥ स्वरज्ञानरतो नित्यं स्वरवादी कवीश्वरः । संसारसागरासारहन्ताऽसौ हि सरस्वती ॥ ३३॥ विद्याभरेण सम्पूर्णः सर्वभारं परित्यजन् । दुःखभारं न जानाति भारती परिकीर्त्यते ॥ ३४॥ ज्ञानतत्त्वेन सम्पूर्णः पूर्णतत्त्वपदे स्थितः । परब्रह्मरतो नित्यं पुरीनामा स उच्यते ॥ ३५॥ भूरिशब्देन सौवर्ण्यं बार्यते येन जीविनाम् । सम्प्रदायो यतीनां च भूरिवारः स उच्यते ॥ ३६॥ चिन्मात्रं चैत्यरहितमनन्तमजरं शिवम् । यो जानाति स वै विद्वान् चैतन्यं तद्विधीयते ॥ ३७॥ मर्यादैषा सुविज्ञेया चतुर्मठविधायिनी । तामेतां समुपाश्रित्य आचार्याः स्थापिताः क्रमात् ॥ ३८॥ आम्नायाः कथिता ह्येते यतीनाञ्च पृथक्-पृथक् । तैः सर्वेश्चतुराचार्यैर्नियोगेन यथाक्रमम् ॥ ३९॥ प्रयोक्ततव्याः स्वधर्मेषु शासनीयास्ततोऽन्यथा । कुर्वन्तु एव सततमटनं धरणीतले ॥ ४०॥ विरुद्धाचरणप्राप्तावाचार्याणां समाज्ञया । लोकान् संशीलयन्त्वेव स्वधर्माप्रतिरोधतः ॥ ४१॥ स्व-स्वराष्ट्रप्रतिष्ठित्यै सञ्चारः सुविधीयताम् । मठे तु नियतो वास आचार्यस्य न युज्यते ॥ ४२॥ वर्णाश्रमसदाचारा अस्माभिर्ये प्रसाधिताः । रक्षणीयाः सदैवैते स्व-स्व भागे यथाविधि ॥ ४३॥ यतो विनष्टिर्महती धर्मस्यास्य प्रजायते । मान्द्यं सन्त्याज्यमेवात्र दाक्ष्यमेव समाश्रयेत् ॥ ४४॥ परस्परविभागे तु न प्रवेशः कदाचन । परस्परेण कर्तव्या ह्याचार्येण व्यवस्थितिः ॥ ४५॥ मर्यादाया विनाशेन लुप्येरन्नियमाः शुभाः । कलहाङ्गारसम्पत्तिरतस्तां परिवर्जयेत् ॥ ४६॥ परिव्राडार्यमर्यादो मामकीनां यथाविधि । चतुष्पीठाधिगां सत्तां प्रयुञ्ज्याच्च पृथक्-पृथक् ॥ ४७॥ शुचिर्जितेन्द्रियो वेद-वेदाङ्गादिविशारदः । योगज्ञः सर्वशास्त्राणां स मदास्थानमापुयात् ॥ ४८॥ उक्तलक्षणसम्पन्नः स्याच्चेन्मत्पीठभाग् भवेत् । अन्यथारूढपीठोऽपि निग्रहार्हो मनीषिणाम् ॥ ४९॥ नजातु मठमुच्छिन्द्यादिधिकारिण्युपस्थिते । विघ्नानामपि बाहुल्यादेष धर्मः सनातनः ॥ ५०॥ अस्मत्पीठसमारूढः परिव्राडुक्तलक्षणः । अहमेवेति विज्ञेयो यस्य देव इति श्रुतेः ॥ ५१॥ एक एवाविषेच्यः स्यादन्ते लक्षणसम्मतः । तत्तत्पीठे क्रमेणैव न बहु युज्यते क्वचित् ॥ ५२॥ सुधन्वनः समौत्सुक्यनिवृत्यै धर्म-हेतवे । देवराजोपचारांश्च यथावदनुपालयेत् ॥ ५३॥ केवलं धर्ममुद्दिश्य विभवो ब्रह्मचेतसाम् । विहितश्चोपकाराय पद्मपत्रनयं व्रजेत् ॥ ५४॥ सुधन्वा हिमहाराजस्तथान्ये च नरेश्वराः । धर्मपारम्परीमेतां पालयन्तु निरन्तरम् ॥ ५५॥ चातुर्वर्ण्यं यथायोग्यं वाङ्मनः कायकर्मभिः । गुरोः पीठं समर्चेत विभागानुक्रमेण वै ॥ ५६॥ धरामालम्ब्य राजानः प्रजाभ्यः करभागिनः । कृताधिकारा आचार्या धर्मतस्तद्वदेव हि ॥ ५७॥ धर्मो मूलं मनुष्याणां स चाचार्यावलम्बनः । तस्मादाचार्यसुमणेः शासनं सर्वतोऽधिकम् ॥ ५८॥ तस्मात् सर्वप्रयत्नेन शासनं सर्वसम्मतम् । आचार्यस्य विशेषेण ह्यौदार्यभरभागिनः ॥ ५९॥ आचार्याक्षिप्त दण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा॥६०॥ इत्येवं मनुरप्याह गौतमोऽपि विशेषतः । विशिष्टशिष्टाचारोऽपि मूलादेव प्रसिद्ध्यति ॥ ६१॥ तानाचार्योपदेशांश्च राजदण्डांश्च पालयेत् । तस्मादाचार्यराजानावनवद्यौ न निन्दयेत् ॥ ६२॥ धर्मस्य पद्धतिर्ह्येषा जगतः स्थितिहेत्वे । सर्ववर्णाश्रमाणां हि यथाशास्त्रं विधीयते ॥ ६३॥ कृते विश्वगुरुर्ब्रह्मा त्रेतायामृषीसत्तमः । द्वापरे व्यास एव स्यात् कलावत्र भवाम्यहम् ॥ ६४॥ मठाश्चत्वार आचार्याचत्वारश्चधुरन्धराः । सम्प्रदायाश्च चत्वार एषा धर्मव्यवस्थितिः ॥ ६५॥ अथोर्ध्वं शेषा आम्नायाः विज्ञानैक विग्रहाः पञ्चमस्तूर्ध्व आम्नायः सुमेरुमठ उच्यते । सम्प्रदायोऽस्य काशी स्यात् सत्यज्ञानाभिधे पदे ॥ ६६॥ कैलासः क्षेत्रमित्युक्तं देवताऽस्य निरञ्जनः । देवी माया तथाचार्य ईश्वरोऽस्य प्रकीर्तितः ॥ ६७॥ तीर्थ तु मानसं प्रोक्तं ब्रह्मतत्त्वावगाहि तत् । तत्र संयोगमात्रेण संन्यासं समुपाश्रयेत् ॥ ६८॥ सूक्ष्मवेदस्य वक्ता च तत्र धर्मं समाचरेत् । षष्ठ स्वात्माख्य आम्नायः परमात्मा मठो महान् ॥ ६९॥ सत्त्वतोषः सम्प्रदायः पदं योगमनुस्मरेत् । नभः सरोवरं क्षेत्रं परहंसोऽस्य देवता ॥ ७०॥ देवी स्यान्मानसी माया आचार्यश्चेतनाह्वयः । त्रिपुटीतीर्थमुत्कृष्टं सर्वपुण्यप्रदायकम् ॥ ७१॥ भव-पाशविनाशाय संन्यासं तत्र चाश्रयेत् । वेदान्तवाक्यवक्ता च तत्र धर्मं समाचरेत् ॥ ७२॥ सप्तमो निष्कलाम्नायः सहस्त्रार्कद्युतिर्मठः । सम्प्रदायोऽस्य सच्छिष्यः श्रीगुरोः पादुके पदे ॥ ७३॥ तत्रानुभूतिः क्षेत्रं स्याद् विश्वरूपोऽस्य देवता। देवी चिच्छक्तिनाम्नी हि आचार्यः सद्गुरुः स्मृतः॥७४॥ सच्छास्त्रश्रवणं तीर्थं जरामृत्युविनाशकम् । पूर्णनन्दप्रसादेन संन्यासं तत्र चाश्रयेत् ॥ ७५॥ ॥ इति श्रीमद्भगवत्पादस्वामि आद्यशङ्कराचार्यकृतः श्रीमन्मठाम्नायमहानुशासनम् सम्पूर्णम् ॥

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